▪️सूर्यकांत उपाध्याय

एक बार स्वर्ग से घोषणा हुई कि भगवान सेब बाँटने आ रहे हैं। सभी लोग भगवान के प्रसाद के लिए तैयार होकर कतार में खड़े हो गए। एक छोटी बच्ची बहुत उत्सुक थी, क्योंकि वह पहली बार भगवान को देखने जा रही थी। भगवान के दर्शन और उनके हाथों से एक बड़ा, सुंदर सेब मिलने की कल्पना मात्र से ही वह खुश थी।
आखिरकार प्रतीक्षा समाप्त हुई। लंबी कतार में जब बच्ची की बारी आई तो भगवान ने उसे एक बड़ा और लाल सेब दिया। लेकिन जैसे ही वह सेब लेकर कतार से बाहर निकली, सेब उसके हाथ से छूटकर कीचड़ में गिर गया। बच्ची बहुत उदास हो गई। अब उसे दोबारा कतार में लगना था। दूसरी कतार पहली से भी लंबी थी, लेकिन कोई दूसरा रास्ता नहीं था। सभी लोग ईमानदारी से अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे।
बच्ची फिर कतार में लग गई। काफी देर बाद जब लगभग आधी कतार को सेब मिल चुके थे, तब सेब कम पड़ने लगे। बच्ची और अधिक चिंतित हो गई। उसने सोचा कि उसकी बारी आने तक तो सारे सेब खत्म हो जाएंगे।
लेकिन वह नहीं जानती थी कि भगवान के भंडार कभी खाली नहीं होते। जब उसकी बारी आई, तब तक नए सेब भी आ चुके थे।
भगवान तो अंतर्यामी होते हैं। उन्होंने बच्ची के मन की बात जान ली। इस बार सेब देते हुए भगवान ने कहा, ‘पिछली बार वाला सेब एक तरफ से सड़ चुका था। वह तुम्हारे लिए उचित नहीं था, इसलिए मैंने ही उसे तुम्हारे हाथ से गिरवा दिया था। दूसरी लंबी कतार में तुम्हें इसलिए प्रतीक्षा करनी पड़ी, क्योंकि नए सेब अभी पेड़ों पर थे और उनके आने में समय बाकी था। यह सेब अधिक लाल, सुंदर और तुम्हारे लिए उपयुक्त है।’
भगवान की बात सुनकर बच्ची संतुष्ट हो गई और खुशी-खुशी वहां से चली गई।
▪️शिक्षा : किसी काम में विलंब हो रहा हो तो उसे भगवान की इच्छा मानकर धैर्य रखना चाहिए। भगवान हमारा भला ही करेंगे।
