▪️सूर्यकांत उपाध्याय

एक सैन्य अधिकारी ने रतन टाटा और ताज होटल से जुड़ा एक भावुक प्रसंग साझा किया है।
गणतंत्र दिवस परेड में शामिल होने के लिए मैं अस्थायी ड्यूटी पर दिल्ली गया था। दो रात रुकने के लिए मैंने अपनी प्रतिष्ठा के कारण ताज होटल चुना। शाम को मैंने रिसेप्शन पर फोन कर अपनी वर्दी प्रेस करने के लिए भेजी।
कुछ देर बाद रूम सर्विस का कर्मचारी वर्दी लेने आया। वर्दी देखकर उसने आश्चर्य से पूछा, ‘सर, क्या आप आर्मी में हैं?’ मेरे हां कहने पर उसने खुशी से मेरे साथ सेल्फी ली और कहा, ‘मैंने पहली बार किसी आर्मी ऑफिसर को देखा है। फिल्मों में ही देखा था।’ इसके बाद उसने सलामी दी और ‘जय हिंद सर’ कहकर चला गया।
रात में डिनर के लिए नीचे पहुंचा तो पूरा स्टाफ मेरा स्वागत करने के लिए खड़ा था। होटल के मैनेजर ने गुलदस्ता देकर स्वागत किया और मेरे साथ डिनर भी किया।
अगले दिन होटल ने मुझे राष्ट्रपति भवन जाने के लिए बीएमडब्ल्यू कार उपलब्ध कराई। मैं इस तरह के वीआईपी व्यवहार का अभ्यस्त नहीं था।
चेकआउट के समय जब मैंने बिल मांगा तो रिसेप्शनिस्ट ने कहा, ‘सर, आपका ठहरना होटल की ओर से प्रायोजित है। आप हमारे राष्ट्र की रक्षा करते हैं। यह हमारी ओर से कृतज्ञता का छोटा-सा प्रतीक है।’
यह सुनकर मैं भावुक हो गया। मुझे लगा कि यह पैसे की बचत का सवाल नहीं, बल्कि सैनिकों के प्रति सम्मान की भावना है।
इसके बाद मैंने ताज समूह के सीईओ को पत्र लिखकर होटल प्रबंधन के इस व्यवहार की सराहना की। जवाब में बताया गया कि ताज समूह ने देशभर के अपने होटलों में सेना के अधिकारियों के ठहरने पर विशेष छूट देने का निर्णय लिया है।
वास्तव में, सैनिकों के सम्मान का इससे बेहतर उदाहरण क्या हो सकता है!
रतन टाटा केवल उद्योगपति नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों और नैतिकता के प्रतीक थे। इसी कारण वे सही मायने में ‘भारत के रत्न’ कहलाने के अधिकारी हैं।
