
▪️बुलढाणा (महाराष्ट्र)
देशभर में जहां रक्षाबंधन भाई-बहन के प्रेम और स्नेह का पर्व बनकर मनाया जा रहा है, वहीं महाराष्ट्र के बुलढाणा जिले के संग्रामपुर तहसील स्थित वानखेड गांव में इस दिन राखी नहीं बांधी जाती। गांव में पालिवाल समाज के लोग रक्षाबंधन को उत्सव के बजाय अपने पूर्वजों की स्मृति और सामूहिक श्रद्धांजलि के दिन के रूप में मनाते हैं। यह परंपरा करीब 735 वर्षों से चली आ रही है।
करीब 10 हजार की आबादी वाले वानखेड में पालिवाल समाज की बड़ी संख्या है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, लगभग 735 वर्ष पहले राजस्थान के पाली क्षेत्र में एक भीषण हमला हुआ था। इस दौरान बड़ी संख्या में पालिवाल ब्राह्मणों के मारे जाने की बात कही जाती है। घटना के बाद समाज के कई परिवारों ने पाली छोड़कर देश के अलग-अलग हिस्सों में पलायन किया।
समाज की परंपरा के अनुसार, यह घटना श्रावणी पूर्णिमा यानी रक्षाबंधन के दिन हुई थी। इसी कारण इस दिन को पालिवाल समाज ने उत्सव के बजाय शोक और पूर्वजों के स्मरण से जोड़ दिया। समाज के लोग मानते हैं कि उस दिन उनके हजारों पूर्वजों ने बलिदान दिया था। हालांकि, इस घटना से जुड़े ऐतिहासिक विवरणों में शासक और घटना को लेकर अलग-अलग दावे मिलते हैं।
वानखेड में हर वर्ष रक्षाबंधन के दिन पालिवाल समाज के लोग एक मंदिर में एकत्र होकर पूर्वजों को सामूहिक श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। इस दिन न बहनें भाइयों की कलाई पर राखी बांधती हैं और न ही घरों में रक्षाबंधन के पारंपरिक पकवान और मिठाइयां बनाई जाती हैं। समाज इस अवसर को ‘एकता दिवस’ के रूप में भी मनाता है।
