▪️सूर्यकांत उपाध्याय

एक दिन एक महिला को किसी धार्मिक स्थल से सेवा का हुक्म आया। वह सेवा के लिए चली गई। थोड़ी देर बाद उसे फोन आया कि उसके बेटे का एक्सीडेंट हो गया है। महिला भगवान से आज्ञा लेकर तुरंत अस्पताल पहुंची।
उसने भगवान से प्रार्थना की और बेटे की देखभाल में लग गई।
उसकी पड़ोसन, जो उसकी अच्छी दोस्त भी थी, बोली, ‘बहन, तेरे भगवान कैसे हैं? तू दिन-रात सेवा में लगी रहती है और उन्होंने तेरे साथ क्या किया? तेरे बेटे का एक्सीडेंट हो गया।’
महिला बोली, ‘मुझे अपने भगवान पर पूरा भरोसा है। वे जो करते हैं, बिल्कुल सही करते हैं। इसमें भी कोई राज जरूर होगा। मेरे भगवान किसी का बुरा नहीं करते। जो होता है, अच्छे के लिए ही होता है।’
कुछ दिनों बाद उसका बेटा ठीक हो गया और महिला फिर सेवा में लग गई। कुछ समय बाद बेटे का दोबारा एक्सीडेंट हो गया। पड़ोसन ने फिर कहा, ‘बहन, तेरे भगवान ने तुझे क्या दिया?’
महिला बोली, ‘कुछ घटनाएं हमारी परीक्षा के लिए भी होती हैं। जरूर मेरे भगवान मुझे कुछ समझाना चाहते हैं। मेरा विश्वास नहीं डोलेगा।’
वह भक्ति और प्रार्थना करती रही। धीरे-धीरे उसका बेटा फिर ठीक हो गया।
कुछ समय बाद तीसरी बार बेटे का एक्सीडेंट हो गया। पड़ोसन बोली, ‘बहन, तू नहीं मानेगी। मुझे अपने बेटे की कुंडली दे, मैं अपने महाराज को दिखाऊंगी।’
महिला बोली, ‘ठीक है, तू भी अपने मन की तसल्ली कर ले, लेकिन मेरा विश्वास नहीं डोलेगा। मेरे भगवान सब ठीक कर देंगे।’
पड़ोसन कुंडली लेकर पंडित जी के पास पहुंची। कुंडली देखकर पंडित जी बोले, ‘जिसकी यह कुंडली है, उसकी मृत्यु तो कई साल पहले हो जानी चाहिए थी। जरूर कोई शक्ति है, जो उसे बचा रही है।’
यह सुनकर पड़ोसन की आंखों में आंसू आ गए। वह दौड़कर अपनी सहेली के पास पहुंची और उसके चरणों में गिरकर बोली, ‘बहन, मुझे भी अपने भगवान की शरण में ले चल।’
• शिक्षा: हमारा विश्वास कभी नहीं डोलना चाहिए। सच्ची श्रद्धा में शक्ति होती है और भगवान हर पल हमारी रक्षा करते हैं।
