▪️सूर्यकांत उपाध्याय

‘चिड़ी चोंच भर ले गई, नदी न घटियो नीर।
दान दिए धन न घटे, कह गए दास कबीर।’
अभिप्राय यह कि जब भगवान ने हमें सामर्थ्य के अनुसार दिया है, तो हमें भी जरूरतमंदों की सहायता के लिए दान करना चाहिए। दानी व्यक्ति कभी वास्तव में घाटे में नहीं रहता। दान का फल कई गुना होकर लौटता है।
रवींद्रनाथ टैगोर ने अपनी पुस्तक पुष्पांजलि में एक सुंदर सत्य कथा का वर्णन किया है। एक बार एक सज्जन बाजार से ज्वार खरीदकर घर लौट रहे थे। रास्ते में उनकी भेंट एक भिखारी से हुई। भिखारी ने हाथ फैलाकर कहा, ‘बाबूजी! कुछ देते जाइए।’ उस सज्जन ने ज्वार में से एक दाना उठाकर उसके हाथ पर रख दिया।
भिखारी ने शुभकामना देते हुए कहा, ‘भगवान आपको खूब दें, अनगिनत होकर मिले।’
घर पहुंचकर सज्जन ने ज्वार अपनी पत्नी को सौंप दी। वह ज्वार साफ करने लगी तो उसमें एक सोने का दाना देखकर चकित रह गई। उसने कहा, ‘लगता है दुकानदार का एक सोने का दाना गलती से इसमें मिल गया है। इसे लौटा आइए।’
यह सुनकर पति को रास्ते में मिले भिखारी की याद आ गई। उन्होंने माथे पर हाथ मारते हुए कहा, ‘धोखा दुकानदार के साथ नहीं, मेरे साथ हुआ है। मैंने भिखारी को केवल एक दाना दिया था और भगवान ने उसे सोने में बदल दिया। यदि मैं मुट्ठी भर ज्वार दे देता तो आज हमारी दरिद्रता दूर हो जाती।’
- संदेश : सच्चे मन से किया गया दान न केवल किसी का जीवन संवारता है बल्कि दाता के मन में भी करुणा, संतोष और आनंद भर देता है।
