▪️सूर्यकांत उपाध्याय

सात फेरों के बाद रंजीता की विदाई हो चुकी थी। विवाह भवन खाली हो रहा था, लेकिन गोविंद बाबू और उनकी पत्नी चंदना देवी का मन बेटी की यादों में उलझा था। इकलौती बेटी के बिना घर कैसा लगेगा, यह सोचकर गोविंद बाबू की आंखें बार-बार भर आतीं। चंदना देवी खुद दुखी थीं, मगर पति को संभालने के लिए हिम्मत बनाए हुए थीं।
समधी का संदेश आ चुका था कि बारात और नवदंपती सकुशल पहुंच गए हैं। बेटी की आवाज सुनने को दोनों बेचैन थे, लेकिन नई बहू के स्वागत में बाधा नहीं बनना चाहते थे।
तभी विवेकानंद जी का वीडियो कॉल आया। गोविंद बाबू को लगा कि शायद बेटी से बात होगी। मगर समधी ने गंभीर स्वर में कहा, “आपकी बेटी ने मुंह दिखाई में ऐसी मांग रख दी है कि हम असमंजस में पड़ गए हैं।”
दोनों घबरा गए।
विवेकानंद जी ने बताया, “दो दिन बाद आनंद और रंजीता हनीमून पर जाने वाले थे। लेकिन रंजीता चाहती है कि घूमना-फिरना बाद में हो। अभी वह अपने नए परिवार के साथ समय बिताना, अपने हाथों से सबके लिए खाना बनाना और नए घर को समझना चाहती है। आनंद भी उसकी बात से सहमत है।”
यह सुनकर चंदना देवी की आंखें खुशी से छलक उठीं। जिस बेटी की चिंता में उनका मन व्याकुल था, वह अपने नए परिवार को अपनाने में जुटी थी।
विवेकानंद जी ने आगे कहा, “हम उसकी इच्छा तभी स्वीकार करेंगे, जब आप दोनों कुछ दिन हमारे घर आकर रहेंगे। समधी-समधन बनकर नहीं, पारिवारिक मित्र बनकर। संकोच हो तो बदले में एक रुपये का सिक्का दे दीजिएगा।”
गोविंद बाबू भावुक हो उठे। तभी दामाद आनंद बोल पड़ा, “बस पापा, अब कुछ मत सोचिए। मैं अभी आप दोनों को लेने आ रहा हूं।”
इस बार गोविंद बाबू और चंदना देवी इनकार नहीं कर सके।
स्क्रीन के एक कोने में खड़ी रंजीता की आंखों से खुशी के आंसू बह निकले। उसे समझ आ गया था कि उसने केवल एक नया घर नहीं पाया, बल्कि अपने माता-पिता के लिए भी एक और घर पा लिया है।
उसकी मुंह दिखाई में मिला एक रुपये का सिक्का दो परिवारों के प्रेम और अपनत्व का अनमोल प्रतीक बन गया।
