▪️सूर्यकांत उपाध्याय

एक बार एक पुत्र अपने पिता से रूठकर घर छोड़कर दूर चला गया। इसके बाद वह इधर-उधर भटकता रहा। दिन बीते, महीने बीते और फिर साल बीत गए।
एक दिन वह बीमार पड़ गया।
अपनी झोपड़ी में अकेले पड़े हुए उसे अपने पिता के प्रेम की याद आई। उसे याद आया कि जब भी वह बीमार होता था, उसके पिता किस तरह उसकी सेवा किया करते थे। बीमारी के दौरान उन्हें इतना प्रेम और अपनापन मिलता था कि वह जल्दी ही ठीक हो जाता था।
उसे एहसास हुआ कि घर छोड़कर उसने बहुत बड़ी गलती की थी। वह उसी रात अंधेरे में अपने घर की ओर चल पड़ा।
घर के नजदीक पहुंचने पर उसने देखा कि आधी रात बीत जाने के बाद भी दरवाजा खुला हुआ है। किसी अनहोनी की आशंका से वह तुरंत अंदर भागा। उसने देखा कि उसके पिता आंगन में लेटे हुए हैं।
बेटे को देखते ही पिता ने अपनी बांहें फैलाकर उसका स्वागत किया। पुत्र की आंखों में आंसू आ गए। उसने पिता से पूछा, “पिताजी, घर का दरवाजा खुला है। क्या आपको आभास था कि मैं लौटकर आऊंगा?”
पिता ने उत्तर दिया, “अरे पगले! यह दरवाजा उस दिन से बंद ही नहीं हुआ, जिस दिन से तू गया है। मैं सोचता था कि पता नहीं तू कब लौट आए और कहीं ऐसा न हो कि दरवाजा बंद देखकर तू वापस लौट जाए।”
• शिक्षा: बच्चों के लिए मां-बाप के दरवाजे हमेशा खुले रहते हैं। उनका प्रेम और अपनापन कभी समाप्त नहीं होता।
