▪️सूर्यकांत उपाध्याय

हिंदू धर्मग्रंथों में शेषनाग और वासुकी का विशेष स्थान है। दोनों नागराजों की उत्पत्ति एक ही परिवार में हुई थी, लेकिन आगे चलकर दोनों ने अलग-अलग देवताओं की सेवा में अपना जीवन समर्पित कर दिया।
पौराणिक कथाओं के अनुसार महर्षि कश्यप की पत्नी कद्रू ने हजारों नागों को जन्म दिया। इनमें शेषनाग और वासुकी प्रमुख थे। शेषनाग सबसे बड़े और अत्यंत बुद्धिमान थे। अपने भाइयों के छल-कपट और अनुचित व्यवहार से दुखी होकर उन्होंने सांसारिक मोह-माया त्याग दी और कठोर तपस्या करने चले गए। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी प्रकट हुए और वरदान मांगने को कहा। शेषनाग ने धर्म और तपस्या में मन लगाए रखने की इच्छा जताई। तब ब्रह्माजी ने उन्हें पृथ्वी का आधार बनने का दायित्व सौंपा। शेषनाग ने अपनी विशाल कुंडली पर पृथ्वी को धारण कर लिया। उनकी भक्ति और समर्पण से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें अपनी शय्या के रूप में स्वीकार किया। तभी से शेषनाग क्षीरसागर में भगवान विष्णु की सेवा करते हैं। उन्हें अनंत भी कहा जाता है।
दूसरी ओर, वासुकी नागों के राजा बने। वे भगवान शिव के परम भक्त माने जाते हैं। पौराणिक मान्यता के अनुसार उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें अपने गले में धारण कर लिया। वासुकी को यह स्थान मिलने के पीछे एक महत्वपूर्ण प्रसंग समुद्र मंथन से भी जुड़ा है। जब देवताओं और असुरों ने अमृत प्राप्त करने के लिए समुद्र मंथन किया, तब मंदराचल पर्वत को मथनी और वासुकी को रस्सी बनाया गया। मंथन से निकले हलाहल विष को भगवान शिव ने संसार की रक्षा के लिए अपने कंठ में धारण किया और नीलकंठ कहलाए।
इस प्रकार एक ही माता-पिता से जन्मे शेषनाग और वासुकी को दो महान देवताओं की सेवा का सौभाग्य मिला। शेषनाग भगवान विष्णु के साथ अनंतता और स्थिरता के प्रतीक बने, वहीं वासुकी भगवान शिव के साथ भक्ति, शक्ति और समर्पण के प्रतीक के रूप में पूजनीय हुए।
