▪️सूर्यकांत उपाध्याय

कृपा प्रसाद नाम के एक धनवान व्यापारी ने पूरी जिंदगी परिवार के सुख-सुविधाओं के लिए धन कमाने में लगा दी। 60 वर्ष की उम्र के बाद जब वह बीमार पड़ा तो उसे एहसास हुआ कि पत्नी और बच्चों के पास उसकी देखभाल के लिए समय नहीं है। पत्नी ने भी कह दिया कि जब परिवार को उसकी जरूरत थी, तब वह धन कमाने में व्यस्त रहता था। इस बात से आहत होकर वह घर से निकलकर समुद्र किनारे पहुंच गया।
वहां उसने एक युवक को रेत का टीला बनाकर उसे बार-बार ठोकर मारते देखा। पूछने पर युवक ने अपना नाम विमल कुमार बताया। वह हृदय रोग विशेषज्ञ था। उसने बताया कि वह प्रतिदिन एक रेत का टीला बनाकर उसे गिराता है। यह उसके भीतर के काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार जैसी बुराइयों को त्यागने का प्रतीक है। उस दिन उसने लोभ पर विजय पाने का संकल्प लिया था।
विमल कुमार उसे अपने घर ले गया। वहां माता-पिता और बहन के प्रेम, संस्कार, ईश्वर भक्ति और सादगी ने कृपा प्रसाद को प्रभावित किया। परिवार ने उसे प्रेमपूर्वक भोजन कराया। साधारण दाल, रोटी और सब्जी में भी उसे अद्भुत स्वाद और संतोष मिला।
विमल के पिता ने उसे राधा-कृष्ण की प्रतिमा और माला देकर भक्ति का मार्ग अपनाने की प्रेरणा दी। घर लौटकर उसने भगवान की प्रतिमा को हृदय से लगाया और भावुक हो उठा। धीरे-धीरे उसके व्यवहार में बदलाव आने लगा। पत्नी और बच्चों ने भी उसकी बीमारी और जरूरतों पर ध्यान देना शुरू कर दिया। परिवार फिर साथ बैठकर भोजन करने लगा।
कृपा प्रसाद समझ गया कि धन से सुविधाएं खरीदी जा सकती हैं, परिवार का प्रेम और मन की शांति नहीं। विमल को धन्यवाद देते हुए उसने कहा कि तुमने मेरे अहंकारी हृदय का उपचार भगवान के नाम से किया है।
- शिक्षा: सच्ची भक्ति केवल पूजा-पाठ या दिखावे में नहीं, बल्कि अपने विकारों पर नियंत्रण, प्रेम, विनम्रता और सदाचार अपनाने में है।
