■ सूर्यकांत उपाध्याय

“सुनो यार… आज सर्दी बहुत है। मैं सोच रहा हूँ, शाम को पापा के लिए कुछ गर्म कपड़े ले आऊँ…”
पति ने पत्नी से कहा।
“देख लो जी… आपने अभी तो बच्चे के लिए भी कपड़े खरीदने हैं और मेरा भी तो मैचिंग शाल दिलवाना है। हमारे लिए तो आप हर बार कह देते हो कि अभी हाथ तंग है, और पापा के लिए पैसे आ ही जाते हैं तुम्हारे पास…”
पत्नी ने कहा।
“नहीं, ऐसी बात नहीं है। तुम समझा करो… मुझे आज भी याद है कि पापा मेरी ज़िद पर मेरे लिए कपड़े दिलवाते थे और अपने लिए कुछ नहीं खरीदते थे। आज तक पापा ने कभी मुझसे कुछ माँगा नहीं…
मैं समझता हूँ, उनके लिए शाल बहुत ज़रूरी है। अगर ठंड लग गई तो बहुत मुश्किल होगी…”
“ठीक है जी, जैसे आप तो बाप हो ही नहीं बच्चों के… जो मन आए, सो करो।”
भरत हैरान था कि क्या करे। आजकल शीतलहर का प्रकोप ज़ोरों पर था। कई लोग इसकी चपेट में आ चुके थे। वह यह भी भली-भाँति जानता था कि अगर सर्दियाँ पार हो गईं तो अस्सी साल के पापा के जीवन का एक साल और बढ़ जाएगा।
मगर बीवी की बातों ने उसका मन खट्टा कर दिया था। शाम को ऑफिस से निकलते हुए देर भी हो गई, इसलिए शाल नहीं खरीद सका।
सुबह-सुबह शोर मचा हुआ था। कोई रिक्शेवाला बुज़ुर्ग रिक्शे पर ठंड में सोते हुए ही ठिठुरकर मर गया था। भरत के पैर अचानक लड़खड़ा गए। वह सीधे बाज़ार की ओर शाल खरीदने चल पड़ा।
उसे लग रहा था मानो यह शोर उसी के आँगन में उठ रहा हो और पिता अकड़े हुए पड़े हों। फटाफट उसने शाल पसंद की और घर की ओर चल पड़ा। पिता को अपने हाथों से शाल ओढ़ाई और अपना सिर उनकी गोद में रख दिया। दो झुर्रियों भरे हाथ उसके सिर को सहला रहे थे।
“बेटा… यह लो पाँच हज़ार रुपये। बहू और बच्चों को आज ही गर्म कपड़े दिलवा दो…
मुझ बूढ़े से इतना प्रेम ठीक नहीं…”
अवाक बहू अपने शब्दों की ऐसी प्रतिध्वनि सुन रही थी, जो उसके मन में चीख़-चीख़कर उसे कोस रहे थे। भरी हुई आँखों से उसका सिर स्वतः ही पापा के पैरों पर नत हो गया।
