
● राजकोट
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने संघ के शताब्दी वर्ष के अवसर पर राजकोट में आयोजित प्रमुख जन गोष्ठी में भाग लेकर सौराष्ट्र-कच्छ के प्रबुद्ध नागरिकों से संवाद किया। सेवा भारती भवन में हुई इस गोष्ठी में उन्होंने राष्ट्र और समाज के प्रति संवेदनशील, समन्वयकारी दृष्टि का स्पष्ट संदेश दिया।
मोहन भागवत ने कहा कि देशहित किसी एक व्यक्ति या संगठन की बपौती नहीं है। यह समाज के हर वर्ग का सामूहिक उत्तरदायित्व है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जो लोग समाज और राष्ट्र के हित में कार्यरत हैं, वे संघ से औपचारिक रूप से जुड़े हों या नहीं, संघ उन्हें स्वयंसेवक की भावना से ही देखता है।
संघ की यात्रा पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि आज संघ को जो प्रतिष्ठा प्राप्त हुई है, वह अनेक उपेक्षाओं, विरोधों और प्रतिबंधों के बावजूद हिंदू समाज के आशीर्वाद का परिणाम है। संघ का कार्य किसी को नियंत्रित करने के लिए नहीं, बल्कि सात्विक प्रेम, आत्मीयता और संस्कारों के आधार पर समाज को जोड़ने के लिए है।
उन्होंने शाखा व्यवस्था के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि शाखाओं के माध्यम से स्वयंसेवकों में संस्कारों का निर्माण होता है। यही संस्कार उन्हें विवेक और समझ के साथ समाजहित में निर्णय लेने की क्षमता प्रदान करते हैं।
हिंदुत्व और राष्ट्र की अवधारणा पर बोलते हुए मोहन भागवत ने कहा कि हिंदुत्व कोई सीमित विचार नहीं, जीवन पद्धति है। संघ उसी जीवन दृष्टि के अनुरूप कार्य करता है, जिस आधार पर भारतीय संविधान की आत्मा निर्मित हुई है। भारत एक हिंदू राष्ट्र है और इसी कारण यह भूमि सभी धर्मों, संप्रदायों और पंथों के लिए स्वाभाविक रूप से स्वागतशील रही है।
