■ सूर्यकांत उपाध्याय

रामायण में तीन मुख्य पात्र महर्षि वशिष्ठ, राजर्षि विश्वामित्र और भगवान परशुराम हैं। इन तीनों दिग्गजों का संबंध और उनकी कथा अत्यंत चित्ताकर्षक है।
राजर्षि विश्वामित्र, महाराज गाधि के पुत्र कौशिक थे। उनकी बहन के पुत्र महर्षि जमदग्नि थे। महर्षि जमदग्नि की पत्नी भगवती रेणुका भी क्षत्रिय थीं और उनके पुत्र भगवान परशुराम थे। इस प्रकार भगवान परशुराम पर उनके मातृकुल और पितृकुल दोनों का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। इस संबंध से राजर्षि विश्वामित्र और परशुराम जी परस्पर संबंधी भी हुए।
राजर्षि विश्वामित्र और महर्षि वशिष्ठ की प्रतिद्वंद्विता भगवान राम के अवतार से पूर्व चरम सीमा पर थी। महाभारत के आदि पर्व में अंगारपर्ण नामक गंधर्व अर्जुन को इन दोनों की एक कथा सुनाता है, जो इस प्रकार है-
इक्ष्वाकु कुल के राजा कल्माषपाद की यजमानी को लेकर दोनों ऋषियों में तनातनी थी। नंदिनी गौ से उत्पन्न यह प्रतिद्वंद्विता राजा तक आ पहुँची थी। एक बार महाराज कल्माषपाद आखेट हेतु वन में गए, जहाँ मार्ग में उनकी भेंट महर्षि वशिष्ठ के ज्येष्ठ पुत्र शक्ति से हुई। मार्ग न छोड़ने के विवाद में कल्माषपाद ने ऋषि को कोड़े से मारा। ऋषि शक्ति ने क्रोधित होकर राजा को शाप दिया-‘चूँकि तुम्हारा व्यवहार राक्षस जैसा है, तुम राक्षस हो जाओ।’ उसी समय वहाँ विचरते किंकर नामक राक्षस ने विश्वामित्र की आज्ञा से राजा के शरीर में प्रवेश कर लिया।
शापित होकर लौटते समय राजा कल्माषपाद की भेंट एक ब्राह्मण से हुई, जिसने उनसे भोजन की याचना की। राजा ने उसे कुछ समय प्रतीक्षा करने को कहा और महल लौटकर रसोइए को भोजन भेजने का आदेश दिया। रसोइए ने भोजन में नरमांस मिलाकर याचक को परोस दिया। अशुद्ध भोजन देखकर ब्राह्मण ने राजा को शाप दिया कि वे नरभक्षी हो जाएँ।
राजा के भीतर स्थित किंकर ने सर्वप्रथम महर्षि वशिष्ठ के पुत्र शक्ति और तत्पश्चात शेष 99 पुत्रों का भक्षण कर लिया। यह देखकर महर्षि वशिष्ठ पुत्रवियोग से व्यथित होकर आत्महत्या के लिए तत्पर हुए। उन्होंने मेरु पर्वत से छलांग लगाई, वन में अग्नि द्वारा दाह करना चाहा, किन्तु सफल न हुए। एक नदी को देखकर उन्होंने स्वयं को लताओं और गुल्मों से बाँधकर उसमें प्रवेश किया, परंतु उस सरिता के वेग ने सभी बंधन तोड़ दिए। तभी महर्षि वशिष्ठ ने उस नदी का नाम ‘विपाशा’ रखा।
इसके पश्चात हेमवती नामक नदी में जलसमाधि लेने का प्रयास किया, किन्तु उनके तेज से वह नदी हजार धाराओं में विभक्त हो गई। इस कारण उसका नाम ‘शतद्रि’ पड़ा, जो कालांतर में ‘सतलज’ कहलायी।
निराश होकर जब महर्षि वशिष्ठ अपने आश्रम की ओर लौट रहे थे, तब उनकी भेंट उनकी गर्भवती पुत्रवधू अदृश्यंती से हुई। उसने उनसे राक्षस बने कल्माषपाद से रक्षा की प्रार्थना की। महर्षि वशिष्ठ ने अभिमंत्रित जल से राजा को शापमुक्त किया और वे पुनः अयोध्या लौट गए।
महर्षि वशिष्ठ के पौत्र महर्षि पराशर हुए, जिन्होंने महाभारत की परंपरा में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
