- आत्मन मिश्रा

दक्षिण मुंबई की पहचान माने जाने वाले मुंबई विश्वविद्यालय का ऐतिहासिक परिसर और राजाबाई क्लॉक टॉवर अपनी भव्यता, वास्तुकला और रोचक इतिहास के कारण विशेष महत्व रखते हैं। इस परिसर का डिजाइन स्कॉटलैंड के प्रसिद्ध वास्तुकार जॉर्ज गिल्बर्ट स्कॉट ने तैयार किया था। दिलचस्प तथ्य यह है कि स्कॉट कभी भारत नहीं आए, बल्कि निर्माण कार्य से जुड़ी रिपोर्टें समय-समय पर उन्हें भेजी जाती थीं। प्रारंभ में इस परियोजना की अनुमानित लागत लगभग 12 लाख रुपये बताई गई थी, जिसे बाद में अन्य वास्तुकारों की मदद से घटाकर करीब 4 लाख रुपये तक कर दिया गया।
राजाबाई क्लॉक टॉवर के निर्माण के लिए प्रारंभिक बजट 15 लाख रुपये निर्धारित किया गया था, लेकिन बाद में इसे घटाकर लगभग 5.47 लाख रुपये में पूरा किया गया। मुंबई विश्वविद्यालय की स्थापना का विचार लंदन विश्वविद्यालय से प्रेरित था, जो प्रारंभ में केवल परीक्षा आयोजित करने वाली संस्था थी। उस समय एल्फिंस्टन कॉलेज, ग्रांट मेडिकल कॉलेज और सेंट ज़ेवियर्स कॉलेज जैसे कई संस्थान इससे संबद्ध थे। 1859 में आयोजित पहले मैट्रिकुलेशन परीक्षा में 132 छात्रों ने भाग लिया था, जिनमें से केवल 22 ही उत्तीर्ण हो पाए। उस बैच में महादेव गोविंद रानाडे और आर. जी. भांडारकर जैसे महान विद्वान भी शामिल थे।
इमारत के निर्माण में दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से सामग्री लाई गई थी। फर्श की टाइलें और कुछ सजावटी लोहे के हिस्से इंग्लैंड से मंगाए गए, जबकि पीला पत्थर कुर्ला से, चूना पत्थर पोरबंदर से, लाल स्तंभ पुणे से और ग्रेनाइट रत्नागिरी से लाया गया। सागौन की लकड़ी बर्मा के जंगलों से लाई गई थी। मुंबई की गर्मी को ध्यान में रखते हुए इमारत में दोहरी छत का विशेष प्रबंध किया गया। भवन के शीर्ष पर मुंबई के विभिन्न समुदायों पारसी, राजपूत, मेमन और हिंदू का प्रतीकात्मक चित्रण भी किया गया है।

करीब 280 फीट ऊंचा राजाबाई क्लॉक टॉवर वेनिसियन गोथिक वास्तुकला का शानदार उदाहरण है। इसकी घड़ी का यांत्रिक तंत्र उसी कंपनी ने तैयार किया था, जिसने लंदन के प्रसिद्ध बिग बेन का निर्माण किया था। इस टॉवर के निर्माण में उस समय के प्रसिद्ध शेयर बाजार निवेशक प्रेमचंद रायचंद ने लगभग 4 लाख रुपये का योगदान दिया था। कहा जाता है कि उनकी दृष्टिहीन माता शाम के समय टॉवर की घंटी सुनकर भोजन का समय पहचानती थीं।
आज मुंबई विश्वविद्यालय देश के प्रमुख विश्वविद्यालयों में गिना जाता है और अपनी ऐतिहासिक धरोहर के साथ आधुनिक सुविधाओं का भी केंद्र है। दक्षिण मुंबई के किसी भी हिस्से से दिखाई देने वाला राजाबाई टॉवर आज भी शहर की सांस्कृतिक और स्थापत्य विरासत का गौरवपूर्ण प्रतीक बना हुआ है।
