■ सूर्यकांत उपाध्याय

अयोध्या बस अड्डे की ठंडी सुबह में बारह वर्षीय पवन स्टील के गिलासों की टोकरी उठाए दौड़ता था। यही बस अड्डा उसका घर था और ढाबा उसकी दुनिया। माता-पिता की सड़क दुर्घटना में मृत्यु के बाद वह चाचा के घर से भी अपमान सहकर निकल आया था। अब उसका सहारा सिर्फ मेहनत थी-बर्तन धोना, मेज़ साफ़ करना और पानी भरना।
एक दिन ढाबा मालिक हरिप्रसाद ने पूछा, “थकता नहीं?”
पवन बोला, “थकता हूँ काका, पर काम ही अब अपना है।”
बस अड्डे के पास हनुमान मंदिर में वह हर मंगलवार जाता। एक दिन उसने सौ रुपये बचाकर प्रसाद चढ़ाया और प्रार्थना की, “एक दिन अपना ढाबा खोलूँगा।” यही उसका सपना बन गया।
चार साल बाद, सोलह वर्ष की उम्र में उसे पहली बार दाल में तड़का लगाने का मौका मिला। घबराहट के बावजूद उसने कोशिश की और दाल का स्वाद ग्राहकों को खूब पसंद आया। उसी दिन से वह रसोई का हिस्सा बन गया।
समय के साथ पवन ने खाना बनाना, व्यवहार और हिसाब-किताब सीखा। जब हरिप्रसाद बीमार पड़े, तो ढाबे की जिम्मेदारी पवन ने संभाली। उसकी मेहनत रंग लाई-ग्राहक बढ़े और ढाबा प्रसिद्ध हो गया। अंततः हरिप्रसाद ने ढाबा पवन के नाम कर दिया।
कुछ समय बाद बस अड्डे पर नया बोर्ड लगा-“श्री हनुमान प्रसाद भोजनालय”
यह कहानी सिखाती है कि सफलता केवल किस्मत नहीं बल्कि अटूट विश्वास, निरंतर परिश्रम और साहस का परिणाम होती है। जब इंसान गिरकर भी उठने की कोशिश करता है, तभी भगवान उसका हाथ थामते हैं।
