■ ‘बतरस’ का स्त्री-केंद्रित सांस्कृतिक आयोजन

● मुंबई
मार्च माह विश्वभर में ‘स्त्री अस्मिता और सशक्तीकरण’ के उत्सव के रूप में जाना जाता है। प्रत्येक वर्ष 8 मार्च को मनाया जाने वाला ‘अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस’ केवल एक तिथि नहीं, बल्कि महिलाओं के संघर्ष, उपलब्धियों और अधिकारों की निरंतर यात्रा का प्रतीक है। यह दिन उन ऐतिहासिक आंदोलनों की स्मृति भी है, जिनके माध्यम से महिलाओं ने शिक्षा, रोजगार और सामाजिक न्याय के क्षेत्र में समान अधिकार प्राप्त किए।
भारतीय संदर्भ में स्त्री ने परंपराओं और सामाजिक बंधनों के बीच अपनी पहचान को सुदृढ़ किया है। आज की नारी शिक्षा, साहित्य, कला, राजनीति और विज्ञान में सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रही है, फिर भी असमानता और चुनौतियाँ बनी हुई हैं। ऐसे में महिला दिवस केवल उत्सव नहीं, बल्कि संवाद और जागरूकता का माध्यम बनता है।
इसी क्रम में मुंबई की सांस्कृतिक संस्था ‘बतरस: एक अनौपचारिक उपक्रम’ ने गोरेगांव में ‘स्त्री: परम्परा व प्रगति की देहरी पर’ कार्यक्रम आयोजित किया। मुख्य वक्ता विभा रानी ने अपने विचार रखते हुए कहा कि समान कार्य के बावजूद स्त्री-पुरुष की मजदूरी में असमानता आज भी चिंता का विषय है। उन्होंने खेतिहर मजदूरों के उदाहरण से इस भेदभाव को रेखांकित किया और वर्तमान निजी क्षेत्रों में भी वेतन असमानता की ओर ध्यान आकर्षित किया।
कार्यक्रम में ‘कविता में स्त्री’ श्रृंखला के अंतर्गत राकेश शर्मा ने कैफ़ी आज़मी की नज़्म का पाठ किया, जबकि जवाहरलाल ‘निर्झर’ ने लोकगीत प्रस्तुत किए। रमन मिश्र, रासबिहारी पांडेय, अनिल गौड़, अंबिका झा, कल्पेश यादव और बृजेश सिंह ने अपनी रचनाओं से श्रोताओं को भावविभोर किया। प्रज्ञा मिश्र, सोनू पाहुजा, आशी मालवीय, डॉ. मधुबाला शुक्ला और प्रमोद सचान ने भी प्रभावशाली प्रस्तुतियाँ दीं।
कार्यक्रम का संचालन प्रतिमा सिन्हा ने किया। इस अवसर पर प्रो. सत्यदेव त्रिपाठी, विजय पंडित, विजय कुमार, शाइस्ता खान, कमर हाजीपुरी, डॉ. आर.एस. रावत और बबीता सहित अनेक साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे।
