■ प्रतिनिधित्व की नई बहस ने पकड़ा जोर

● नई दिल्ली
देश में एक बार फिर परिसीमन यानी निर्वाचन क्षेत्रों के सीमांकन को लेकर राजनीतिक तापमान तेजी से बढ़ गया है। केंद्र सरकार की ओर से लोकसभा सीटों के पुनर्निर्धारण की दिशा में आगे बढ़ने के संकेत मिलते ही विपक्षी दलों ने कड़ा रुख अपना लिया है। यह मुद्दा अब केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रह गया, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गया है।
परिसीमन का मूल उद्देश्य जनसंख्या के आधार पर लोकसभा और विधानसभा सीटों की सीमाओं तथा संख्या को संतुलित करना है, ताकि हर नागरिक को समान प्रतिनिधित्व मिल सके। स्वतंत्र भारत में समय-समय पर यह प्रक्रिया अपनाई गई, लेकिन 1976 में संविधान संशोधन के माध्यम से इसे वर्ष 2001 तक स्थगित कर दिया गया था। इसका उद्देश्य राज्यों को जनसंख्या नियंत्रण के लिए प्रेरित करना था। बाद में 2001 की जनगणना के आधार पर सीमाओं में आंशिक बदलाव हुआ, किन्तु सीटों की कुल संख्या यथावत रखी गई। इसके पश्चात 84वें संविधान संशोधन के जरिए इस रोक को 2026 तक बढ़ा दिया गया।
अब संकेत मिल रहे हैं कि 2026 के बाद नई जनगणना के आंकड़ों के आधार पर परिसीमन की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है। सरकार का तर्क है कि तेजी से बढ़ती आबादी वाले राज्यों को अधिक प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए, जिससे लोकतांत्रिक संतुलन बना रहे। दूसरी ओर, विपक्ष और विशेषकर दक्षिण भारत के राज्यों की पार्टियां इस प्रस्ताव को लेकर आशंकित हैं। उनका मानना है कि यदि केवल जनसंख्या को आधार बनाया गया, तो उन राज्यों की लोकसभा सीटें घट सकती हैं, जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है।
विपक्ष का यह भी कहना है कि इससे क्षेत्रीय असंतुलन बढ़ेगा और राष्ट्रीय राजनीति में शक्ति का केंद्र कुछ विशेष राज्यों की ओर झुक सकता है। ऐसे में यह बहस केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं रह जाती, बल्कि इसमें न्याय, संतुलन और संघीय ढांचे की भावना भी जुड़ जाती है।
आगे की राह आसान नहीं मानी जा रही है। परिसीमन की प्रक्रिया संविधान और संसद की मंजूरी के दायरे में ही आगे बढ़ेगी तथा इसके लिए एक स्वतंत्र परिसीमन आयोग का गठन किया जाएगा। सबसे बड़ी चुनौती राजनीतिक सहमति बनाना होगी, क्योंकि यह निर्णय देश के भविष्य के राजनीतिक मानचित्र को प्रभावित करेगा।
स्पष्ट है कि परिसीमन का प्रश्न केवल सीटों के पुनर्वितरण का विषय नहीं, बल्कि लोकतंत्र के स्वरूप और प्रतिनिधित्व की दिशा तय करने वाला एक महत्वपूर्ण मोड़ बनता जा रहा है।
