■ सूर्यकांत उपाध्याय

रिश्ते कभी अचानक नहीं टूटते; वे धीरे-धीरे असंतुलित होते जाते हैं, जैसे तराजू का एक पलड़ा भारी हो जाए और दूसरा हल्का रह जाए। प्रेम, सम्मान और अपनापन भी उसी तराजू पर तौले जाते हैं, जहाँ बराबरी ही सच्चा संतुलन लाती है।
“मैं अब वापस नहीं जाऊँगी उस घर में! उन्हें बस अपनी माँ की ही चिंता रहती है। मेरी भावनाओं की तो कोई कीमत ही नहीं!”
ससुराल से नाराज़ होकर मायके आई आर्या रोष से भरी बैठी थी। आँखों में आँसू, स्वर में शिकायत और मन में आक्रोश था। उसकी माँ रजनीजी शांत भाव से सब सुन रही थीं। वे समझ रही थीं, यह कोई बहुत बड़ी बात नहीं, बल्कि छोटे-छोटे अहं और अपेक्षाओं की टकराहट है, जो हर घर में कभी-न-कभी हो ही जाती है।
जब आर्या अपनी भड़ास निकालकर चुप हुई, तो रजनीजी ने सहज स्वर में पूछा,
“बेटी, जब हम बाज़ार से सब्ज़ी लाते हैं, तो क्या करते हैं?”
आर्या ने झुँझलाकर कहा,
“माँ, यह भी कोई पूछने की बात है? तराजू में तौलते हैं।”
“और सही वजन के लिए क्या करते हैं?”
“एक पलड़े में सब्ज़ी रखते हैं, दूसरे में बाट।”
रजनीजी हल्का-सा मुस्कराईं, फिर गंभीर होकर बोलीं,
“अगर हमें एक किलो सब्ज़ी चाहिए, तो क्या दो सौ ग्राम का बाट रखकर काम चल जाएगा?”
आर्या ने अधीरता से कहा,
“नहीं माँ, ऐसा कैसे हो सकता है? एक किलो चाहिए तो एक किलो का ही बाट रखना पड़ेगा।”
रजनीजी ने उसकी आँखों में देखते हुए धीमे, किंतु गूँजते स्वर में कहा,
“तो फिर तुम दो सौ ग्राम सम्मान और थोड़ा-सा प्रेम देकर एक किलो अपनापन क्यों चाहती हो?”
आर्या जैसे ठिठक गई। उसके भीतर कुछ पिघलने लगा।
रजनीजी आगे बोलीं,
“बेटी, रिश्ते भी तराजू जैसे होते हैं। तुम चाहती हो कि तुम्हारा पति तुम्हारी हर बात समझे, तुम्हें सबसे ऊपर रखे। लेकिन क्या तुमने उसकी माँ को माँ जैसा सम्मान दिया? क्या तुमने कभी उनके मन की बात समझने की कोशिश की? क्या तुमने उसके दायित्वों को समझकर उसका साथ दिया?”
आर्या की आँखें झुक गईं। उसे याद आया, सास की छोटी-छोटी बातों पर वह तुनक जाती थी। जब पति अपनी माँ के लिए चिंतित होता, तो उसे लगता कि उसके हिस्से का प्रेम कम हो रहा है। उसने कभी यह नहीं सोचा कि एक बेटा अपनी माँ से भी उतना ही जुड़ा होता है, जितना एक पत्नी अपने पति से।
रजनीजी ने उसका हाथ थामते हुए कहा,
“घर में हर किसी को अपने हिस्से का प्रेम और सम्मान चाहिए। तुम यदि अपने पलड़े में धैर्य, समझदारी और स्नेह रखोगी, तो सामने वाले का पलड़ा भी अपने आप भरने लगेगा। रिश्तों का संतुलन माँगने से नहीं, निभाने से बनता है।”
आर्या की आँखों से आँसू बह निकले पर इस बार वे आक्रोश के नहीं, आत्मबोध के आँसू थे।
उसे लगा, माँ सच कह रही थीं। सचमुच, वह तराजू को एक ही ओर झुकाए बैठी थी।
अगले दिन उसने स्वयं अपने पति को फोन किया। स्वर में अब शिकायत नहीं, अपनापन था।
“मुझे भी सीखना है… संतुलन रखना,” उसने धीमे से कहा।
उसके भीतर का तराजू अब धीरे-धीरे बराबर होने लगा था।
