■ सूर्यकांत उपाध्याय

आज हम आपके लिए एक अत्यंत भावपूर्ण और शिक्षाप्रद प्रसंग लेकर आए हैं, “जब माता सती को प्रभु श्रीराम के नारायण स्वरूप पर संदेह हुआ।”
एक बार भगवान शिव माता सती को श्रीराम की महिमा बता रहे थे। वे कह रहे थे-
“सती, श्रीराम कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं। वे स्वयं परब्रह्म, साक्षात् नारायण हैं, जो इस पृथ्वी पर लीला करने आए हैं।”
माता सती ने श्रद्धा से यह सब सुना, परंतु उनके मन में एक हल्का-सा संदेह उत्पन्न हो गया-
“यदि वे भगवान हैं, तो फिर सीता के वियोग में दुखी होकर वन-वन क्यों भटक रहे हैं?”
इसी बीच भगवान शिव और माता सती ऋषि अगस्त्य के आश्रम पहुँचे, जहाँ श्रीराम की कथा का वर्णन हो रहा था।
अगस्त्य मुनि बड़े भाव से बता रहे थे कि किस प्रकार श्रीराम, सीता माता के अपहरण के बाद व्याकुल हो गए, उन्हें ढूँढते रहे, रोए, पेड़ों से पूछते रहे, वनवासियों से भी पूछते रहे।
सती ने सोचा, यदि कोई भगवान है, तो उसे सब ज्ञात होना चाहिए। फिर यह दुःख, यह खोज, ये अश्रु क्यों?
उनके मन में प्रश्न उठा, क्या ये सच में वही भगवान हैं, जिनकी महिमा शिवजी ने कही है?
जब शिवजी और सती वहाँ से लौटने लगे, तो सती ने मन ही मन विचार किया
“मैं स्वयं जाकर देखती हूँ। यदि ये सच में नारायण हैं, तो मुझे पहचान लेंगे।”
उन्होंने माया से सीता माता का रूप धारण किया और श्रीराम के समक्ष प्रकट हुईं।
श्रीराम मुस्कराए।
उन्होंने सिर झुकाकर कहा-
“प्रणाम माता, क्या सब कुशल है?”
माता सती आश्चर्यचकित रह गईं। उन्हें समझ में आ गया कि श्रीराम सर्वज्ञ हैं; उन्होंने सती को तुरंत पहचान लिया।
वे लज्जा से भर गईं और सिर झुका लिया।
जब भगवान शिव को यह ज्ञात हुआ कि सती ने श्रीराम की परीक्षा ली है, तो उन्होंने मन ही मन सती का त्याग कर दिया।
उन्होंने सती से कोई कटु वचन नहीं कहा, न ही तिरस्कार किया, वे मौन हो गए।
उनका यह मौन बहुत कुछ कह गया।
सती भी समझ गईं कि उन्होंने जो किया, वह अनुचित था। उन्होंने पश्चाताप किया, पर अब एक ओर शिवजी की भक्ति और दूसरी ओर श्रीराम के अनादर का बोझ था।
● शिक्षा: जहां श्रद्धा हो, वहां संदेह न करें।
