■ शहरी उदासीनता बनाम ग्रामीण सक्रियता

● मुंबई
मुंबई उपनगर जिले में मतदाता मैपिंग की रफ्तार चिंताजनक रूप से धीमी पाई गई है, जिससे प्रशासन की चिंता बढ़ गई है। राज्य में चल रहे प्री-स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन अभियान के तहत यहां अब तक केवल 36.31 प्रतिशत मैपिंग ही पूरी हो सकी है, जो राज्य के औसत 64.77 प्रतिशत से काफी कम है।
इसके विपरीत, आदिवासी बहुल गडचिरोली जिले ने 90.2 प्रतिशत मैपिंग के साथ राज्य में शीर्ष स्थान हासिल किया है। यह अंतर स्पष्ट रूप से शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच जागरूकता तथा भागीदारी के स्तर को उजागर करता है।
राज्य चुनाव आयोग द्वारा संचालित इस अभियान का उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक सटीक, अद्यतन और पारदर्शी बनाना है। इसके अंतर्गत वर्तमान मतदाताओं के आंकड़ों को वर्ष 2002 की मतदाता सूची से जोड़ा जा रहा है, जब अंतिम बार व्यापक पुनरीक्षण किया गया था।
इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया के निर्देशों के अनुसार, जिन मतदाताओं के नाम वर्ष 2002 की सूची में पहले से दर्ज हैं, उन्हें नागरिकता प्रमाण के लिए अतिरिक्त दस्तावेज प्रस्तुत करने की आवश्यकता नहीं होगी। वहीं, जिनका नाम उस सूची में नहीं है, उनकी पहचान बूथ लेवल अधिकारियों (बीएलओ) द्वारा घर-घर जाकर सत्यापित की जाएगी।
मुंबई, ठाणे और पुणे जैसे महानगरों में इस प्रक्रिया को अपेक्षित प्रतिसाद नहीं मिल रहा है, जबकि ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में लोगों की सक्रिय भागीदारी साफ दिखाई दे रही है। यह परिदृश्य प्रशासन के लिए एक संकेत है कि शहरी क्षेत्रों में जनजागरूकता बढ़ाने के लिए अतिरिक्त प्रयासों की आवश्यकता है।
