■ सूर्यकांत उपाध्याय

राजा भोज अपनी राज्यसभा में बैठे हुए थे। सभी सभासद सामने विराजमान थे। तभी अचानक एक अत्यंत विद्वान व्यक्ति राज्यसभा में प्रवेश करता है।
राजा भोज के सामने वह संस्कृत भाषा में धाराप्रवाह बोलना प्रारंभ कर देता है। उसका भाषण सुनकर सभी सभासद प्रसन्न हो जाते हैं, परंतु राजा भोज अपनी खुशी प्रकट नहीं करते।
जब वह विद्वान वहां से चला जाता है, तब मंत्री पूछते हैं, “राजन, क्या बात है? वह व्यक्ति इतनी विद्वता के साथ प्रवचन कर रहा था, फिर भी आपने उसे कोई उपहार भेंट नहीं किया।”
राजा भोज कहते हैं, “मैंने उसे कोई उपहार नहीं दिया, क्योंकि मुझे लगा कि वह केवल भाषण दे रहा है, इसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं। मेरी समझ में यह नहीं आ रहा कि उसकी मातृभाषा क्या है। क्या तुम मुझे बता सकते हो कि उसकी मातृभाषा क्या है?”
मंत्री ने कहा, “राजन, मुझे एक दिन का समय दें। मैं कल आपको उसकी मातृभाषा का पता चलवा दूंगा।”
अगले दिन जब पंडित जी राज्यसभा में आते हैं और सीढ़ियां चढ़ना प्रारंभ करते हैं, तभी मंत्री अचानक आते हैं और उन्हें जोर से धक्का दे देते हैं।
पंडित जी लड़खड़ाते हुए सीढ़ियों से नीचे लुढ़क जाते हैं। उनका शरीर छिल जाता है और उन्हें बहुत क्रोध आ जाता है। गुस्से में वे मंत्री को गालियां देना प्रारंभ कर देते हैं।
पंडित जी के मुख से निकलती गालियां सुनकर मंत्री मुस्कुराते हुए कहते हैं, “राजन, यही इनकी वास्तविक मातृभाषा है, जिस भाषा में ये अभी गालियां दे रहे हैं।”
मंत्री का यह समाधान सुनकर राजा भोज अत्यंत प्रसन्न हो जाते हैं और कहते हैं, “मंत्री, मुझे यह समझ में नहीं आया कि तुमने इसकी मातृभाषा का पता इसके मुख से कैसे लगवा दिया?”
मंत्री ने उत्तर दिया, “राजन, तोता तभी तक ‘राम-राम’ कहता है, जब तक उसके सामने कोई संकट नहीं आता। जैसे ही बिल्ली सामने आती है, वह ‘टें-टें’ करने लगता है।
विपत्ति के समय ही मनुष्य की असली भाषा की पहचान होती है। सामान्य समय में वह स्वयं को भाषा के आवरण में छिपाकर विद्वान दिखाई देता है, परंतु जब उसके जीवन में समस्या आती है, तब वह अपनी मातृभाषा बोलने लगता है।”
