■ पुस्तक समीक्षा @ डॉ. श्रीमती शीतल
सहायक प्रोफेसर, दौलत राम कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय

हजारों वर्षों से हमारा देश ‘भारत’ नाम से प्रख्यात रहा है। इसके पीछे इसकी प्राचीन और समृद्ध पृष्ठभूमि है। हमारे देश के ‘भारत’ नाम को लेकर भी लोगों के बीच विभिन्न प्रकार की भ्रांतियाँ व्याप्त रही हैं। जम्बूद्वीप, अजनाभवर्ष, आर्यावर्त, सप्तसिंधु, भारतवर्ष, हिंदुस्तान आदि नामों को लेकर सामान्य जन के मन में अनेक प्रश्न उठते रहे हैं। इन प्रश्नों का विस्तार से उत्तर लेखक-द्वय डॉ. मोतीलाल गुप्ता ‘आदित्य’ और डॉ. राजेश्वर कुमार ने अपनी नई पुस्तक ‘इंडिया नहीं भारत’ में दिया है।
पुस्तक के प्रथम अध्याय में ‘भारत’ नाम की व्युत्पत्ति के बारे में बताया गया है। ‘भारत’ नाम का अर्थ ‘भा+रत’ अर्थात ज्ञान के प्रकाश में लीन बताया गया है। यहाँ ‘भारत’ नाम से ‘इंडिया’ नाम तक पहुँचने की संक्षिप्त जानकारी दी गई है।
द्वितीय अध्याय में मानव जीवन के प्रारंभ से लेकर सिंधु घाटी सभ्यता के उद्गम और भारत के उदय के बारे में धार्मिक मान्यताओं में वर्णित सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग की काल-गणना के साथ ऐतिहासिक काल-गणना को प्रस्तुत किया गया है। हमारे देश के ‘भारत’ नाम का संबंध जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव के पुत्र भरत से जोड़ा गया है। इसी कारण इस पुस्तक में 24 तीर्थंकरों के बारे में भी जानकारी दी गई है।
अध्याय 3 में हमारे देश के प्राचीन नामों से संबंधित समग्र जानकारी दी गई है। पुराणों में वर्णित 18 पुराणों के नामों का उल्लेख किया गया है। यह बताया गया है कि पृथ्वी के सात द्वीप, जिन्हें आज महाद्वीप कहा जाता है, उनमें से एक ‘जंबूद्वीप’ है, जिसकी खोज प्रथम मनु स्वायंभुव के पौत्र आग्नीध्र द्वारा की गई मानी जाती है। इसलिए 14 मनुओं का विवरण भी प्रस्तुत किया गया है। ‘जंबूद्वीप’ के सात वर्षों (भागों) में से एक ‘भारतवर्ष’ है। इस अध्याय में ‘जंबूद्वीप’ और ‘अजनाभवर्ष’ से लेकर हमारे देश के प्रचलित नामों तथा सिंधु नदी के नाम से विदेशों में प्रचलित विभिन्न रूपों की जानकारी दी गई है।
अध्याय 4 में ‘भारत’ नाम के संदर्भ में वेदों, पुराणों, जैन आख्यानों, श्रीमद्भगवद्गीता, महाभारत आदि प्राचीन ग्रंथों में प्राप्त उल्लेखों को प्रस्तुत किया गया है। साथ ही ‘भारत’ नाम से जुड़े पुरातात्विक प्रमाणों का भी उल्लेख किया गया है।
अध्याय 5 में ‘इंडिया’ नाम की उत्पत्ति पर प्रकाश डाला गया है। इसमें बताया गया है कि उच्चारण भिन्नता के कारण यूनानियों ने सिंधु नदी को ‘इंडु’ कहा, जिससे ‘इंडोस’ और अंततः ‘इंडिया’ शब्द बना। यूरोपीय शासन के साथ ‘इंडिया’ नाम भारत में आया और ब्रिटिश शासनकाल में इसे व्यापक रूप से प्रचलित किया गया। पुस्तक में ‘इंडिया’ और उससे बने ‘इंडियन’ शब्द के अर्थ पर भी चर्चा की गई है।
अध्याय 6 में संविधान सभा में ‘इंडिया’ नाम को लेकर उठी आपत्तियों तथा समय-समय पर संसद और विधानसभाओं में ‘भारत’ नाम के पक्ष में उठी माँगों का ऐतिहासिक विवरण प्रस्तुत किया गया है। सर्वोच्च न्यायालय में दायर याचिकाओं की जानकारी भी इसमें दी गई है। इस प्रकार यह पुस्तक स्वतंत्रता से लेकर वर्तमान समय तक ‘इंडिया’ के स्थान पर ‘भारत’ नाम को स्थापित करने की सतत् माँग के विभिन्न चरणों को रेखांकित करती है।
अध्याय 7 में ‘भारत’ और ‘इंडिया’ नाम के विषय पर आध्यात्मिक महापुरुषों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, जनप्रतिनिधियों तथा विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिष्ठित व्यक्तियों के विचार प्रस्तुत किए गए हैं। इसके साथ ही ‘भारत’ नाम को प्रतिष्ठित करने के लिए प्रयासरत व्यक्तियों और संस्थाओं का विवरण भी दिया गया है। अंत में ‘इंडिया नहीं, मैं भारत हूँ’ शीर्षक गीत के माध्यम से ‘भारत’ नाम की प्राचीनता का गौरव-गान किया गया है।
जी-20 सम्मेलन के दौरान भारत सरकार द्वारा राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के निमंत्रण-पत्र में अंग्रेजी भाषा में भी ‘भारत’ नाम के प्रयोग ने इस विमर्श को नई दिशा दी है।
सभी प्रयोजनों और सभी भाषाओं में ‘भारत’ नाम के प्रयोग के समर्थन में अनेक विश्वविद्यालयों और शिक्षण संस्थानों द्वारा पारित प्रस्ताव यह संकेत देते हैं कि देश अब ‘इंडिया’ नाम के स्थान पर अपने प्राचीन और गौरवशाली ‘भारत’ नाम की ओर अग्रसर हो रहा है।
‘इंडिया नहीं भारत’ पुस्तक एक ओर जहाँ देश के नाम से संबंधित रोचक तथ्यों और इतिहास से पाठकों को परिचित कराती है, वहीं दूसरी ओर ‘भारत’ नाम की ओर बढ़ते सामाजिक और वैचारिक परिवर्तन की आहट भी देती है।
इस पुस्तक को अनंग प्रकाशन, दिल्ली द्वारा प्रकाशित किया गया है। इसके लेखक हैं गृह मंत्रालय, राजभाषा विभाग के पूर्व उपनिदेशक डॉ. मोतीलाल गुप्ता ‘आदित्य’ तथा मुजफ्फरपुर के एक महाविद्यालय में कार्यरत सहायक प्रोफेसर डॉ. राजेश्वर कुमार।
