■ पुस्तक समीक्षा @राजेश विक्रांत

मुंबई महानगर के सुप्रसिद्ध कवि, कथाकार, गीतकार, ग़ज़लकार, आलोचक तथा ‘स्वर संगम फाउंडेशन’ के माध्यम से साहित्यिक कार्यक्रमों के पुरोधा हृदयेश मयंक का ताज़ातरीन कहानी-संग्रह है ‘विरसे की कहानियां’। इसे न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन, इंद्रपुरी, नई दिल्ली ने प्रकाशित किया है। यह पुस्तक डॉ. सोमनाथ चट्टोपाध्याय, डॉ. गौरव मेहता एवं उनकी टीम को समर्पित है।
इसमें कुल 25 कहानियां हैं ‘रेत पर बनते ढहते घरौंदे’, ‘लवंग वाले बाबा’, ‘आतिथ्य’, ‘प्रतिकार’, ‘एक रात का दर्द’, ‘किनारा’, ‘एक और रमदयालपुर’, ‘संताप’, ‘जमीन का एक टुकड़ा’, ‘शवों की दलाली’, ‘कुल गाथा’, ‘हथेली में जमी अठन्नी’, ‘कुम्हलाए अमलतास के फूल’, ‘शापग्रस्त’, ‘हवा में पुल’, ‘मधुबन की राधिका’, ‘स्मृतिदंश’, ‘संघर्ष की राह बरास्ते दगडया हनुमान’, ‘कद्दावर फकीर’, ‘कुछ भी रहा न शेष’, ‘अभिशप्त’, ‘सबके दिन बहुरें’, ‘वफादारी’, ‘बेघर-बार’ तथा ‘घर’।
मयंक जी आम आदमी के रचनाकार हैं। उनकी प्रकाशित कृतियां हैं ‘मैं शहर और सूरज’ (कविता संग्रह), ‘सायरन से सन्नाटे तक’ (गीत संग्रह), ‘युद्ध में शामिल नहीं थीं चिड़ियाएं’ (कविता संग्रह), ‘ठहराव के विरुद्ध’ (कविता संग्रह), ‘अभी भी बचा हुआ है बहुत कुछ’ (कविता संग्रह), ‘हम ये जो मिट्टी के बने हैं’ (कविता संग्रह), ‘अपने हिस्से की धूप’ (ग़ज़ल संग्रह), ‘दिल से निकली दिल की बात’ (ग़ज़ल संग्रह), ‘रेत पर बनते ढहते घरौंदे’ (कहानी संग्रह), ‘मुंबई का साहित्यिक परिदृश्य: एक पुनरावलोकन’ (आलोचना), ‘मेरी बस्ती में रोशनी है अभी’ (आलोचना), ‘एक महक सोंधी माटी की’ (गीत-नवगीत संग्रह) तथा ‘सिवान में बांसुरी’ (कविता संग्रह)।
मयंक की कहानियां सीधे, सरल और सच्चे पात्रों की दास्तान हैं, जिनमें गांव, शहर, समाज, नज़दीकी संबंध, रिश्तेदारी, अध्यापक, पंडित, विद्वान, कवि-साहित्यकार आदि वास्तविकता के साथ मौजूद हैं। यहां तक कि उनकी एक कहानी ‘घर’ में एक कविता भी शामिल है। पुस्तक के बारे में मयंक जी कहते हैं कि इसमें कुछ स्मृतियां, कुछ किस्से और कुछ घटनाओं को कहानी की शक्ल में पिरोने का प्रयास किया गया है। दरअसल, बचपन से कहने-सुनने का जो संस्कार मिला, उसे जीवन भर जिलाए रखते हुए अगली पीढ़ी तक पहुंचाने के दायित्व का निर्वहन भी आवश्यक है। शायद इसी कारण इस संग्रह को प्रस्तुत करने का विचार आया।
‘विरसे की कहानियां’ में गांव के साथ-साथ मुंबई के जीवन का चित्रण भी बखूबी मिलता है। संग्रह की पहली कहानी ‘रेत पर बनते ढहते घरौंदे’ सुधीर और शर्मिष्ठा के जीवन-संघर्ष की दास्तान है, एक ऐसी कहानी, जिससे आम मुंबईकरों का रोज सामना होता है। दोनों का परिवार मूलतः कोंकण क्षेत्र का है, पर वे गिरगांव की एक दो-मंज़िली चाल में रहते हैं, शर्मिष्ठा का परिवार पहली मंज़िल पर और सुधीर का तल मंज़िल पर। दोनों की प्राथमिक शिक्षा एक ही स्कूल में होती है और वे चर्चगेट के के.सी. कॉलेज में भी साथ पढ़ते हैं। इसी दौरान दोनों को प्रेम हो जाता है। विवाह के बाद वे गोरेगांव में बसते हैं और उनके यहां एक संतान भी होती है। यह एक सामान्य दंपति की कहानी है, जिसमें संवेदनशीलता, गिरगांव चौपाटी, गणेशोत्सव की रौनक, परस्पर प्रेम-मनुहार, रूठना-मनाना और दांपत्य संबंधों में व्याप्त क्षमा का भाव सजीव रूप में उभरता है।
‘एक रात का दर्द’ मुंबई महानगरपालिका में कार्यरत शिक्षक राजेश्वर सिंह के एक छत पाने के संघर्ष की कहानी है, जिसमें अपने लोगों के सहयोग से वह सपना साकार होता है। यह शहरी व्यवस्था में संघर्षरत बेघर व्यक्ति की मार्मिक कथा है। ‘शवों की दलाली’ आज की क्रूर व्यवस्था का सच उजागर करती है, तो ‘हवा में पुल’ भू-माफिया के षड्यंत्रों की परतें खोलती है। ‘संघर्ष की राह पर बरास्ते दगडया हनुमान’ धर्म के दुरुपयोग की कड़वी सच्चाई को सामने लाती है। इसके अलावा ‘कुछ भी रहा न शेष’, ‘अभिशप्त’ तथा ‘बेघर-बार’ में भी मुंबई का संघर्ष और उसकी जीवटता प्रभावी ढंग से उभरती है।
‘लवंग वाले बाबा’ में राजन अपनों द्वारा प्रताड़ित है। जब उसे पता चलता है कि उसके बेटों ने गांव की सारी संपत्ति और बैंक की जमा राशि अपने नाम करा ली है, तो वह उनके कागज़ जला देता है और अपनी पूरी संपत्ति एक वृद्धाश्रम को दान कर देता है।
ग्रामीण जीवन में प्रतिरोध को रेखांकित करती ‘प्रतिकार’ गांव में आए बदलावों की कहानी है, जबकि ‘किनारा’ नन्हकी के जीवन की कथा है, जिसे उसकी उजड़ी दुनिया फिर से मिल जाती है। ‘संताप’ में जीवन के उतार-चढ़ाव और संघर्षों का चित्रण है, तो ‘कुल गाथा’ एक सुप्रसिद्ध पौराणिक लोककथा को कहानी के रूप में प्रस्तुत करती है। कोरोना काल में शहरों से गांवों की ओर लौटते लोगों के पश्चाताप और पुनः गांव से जुड़ने की ललक ‘जमीन का एक टुकड़ा’ में अभिव्यक्त होती है। ‘शापग्रस्त’ में रज़िया के माध्यम से यह दिखाया गया है कि कुछ ही वर्षों में एक समृद्ध घर कैसे अभिशप्त हो सकता है। ‘मधुबन की राधिका’ संबंधों को नए सिरे से परिभाषित करने वाली कहानी है।
कुल मिलाकर, ‘विरसे की कहानियां’ आम जनजीवन के सुख-दुःख की सजीव दास्तान है। 210 पृष्ठों की इस पुस्तक का मूल्य 399 रुपये है।
