■ सूर्यकांत उपाध्याय

राधेश्याम नाम का एक युवक बहुत शांत, सज्जन और सुसंस्कृत था। उसका छोटा-सा परिवार था माता-पिता, पत्नी और दो बच्चे। वह सभी से प्रेम करता था। वह श्रीकृष्ण का अनन्य भक्त था तथा जरूरतमंदों की सहायता करता था। उसके इन्हीं गुणों से प्रसन्न होकर श्रीकृष्ण सदैव उसके साथ रहते थे। राधेश्याम उन्हें देख भी सकता था और उनसे मित्र की तरह बातें भी करता था।
एक दिन उसके पिता अचानक गंभीर रूप से बीमार पड़ गए। उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया। राधेश्याम ने डॉक्टरों से बहुत विनती की, लेकिन सभी ने कहा कि अब सब कुछ ईश्वर के हाथ में है।
हताश होकर उसने श्रीकृष्ण को पुकारा। कृष्ण तुरंत प्रकट हुए। राधेश्याम बोला, “मित्र! आप तो भगवान हैं, मेरे पिता को बचा लीजिए।”
कृष्ण ने शांत स्वर में कहा, “मित्र, मृत्यु जीवन का अटल सत्य है। समय आने पर उसे कोई नहीं टाल सकता।”
यह सुनकर राधेश्याम क्रोधित हो गया। तब कृष्ण ने कहा, “यदि तुम मेरी सहायता चाहते हो तो ऐसे घर से मुट्ठीभर ज्वार लेकर आओ, जहाँ कभी किसी की मृत्यु न हुई हो।”
राधेश्याम घर-घर भटका। हर घर में किसी न किसी प्रियजन की मृत्यु हो चुकी थी। तब उसे समझ आया कि मृत्यु से कोई नहीं बच सकता। उसने कृष्ण से क्षमा माँगी और निश्चय किया कि पिता के जीवित रहते उनकी पूरी सेवा करेगा।
कुछ समय बाद उसके पिता का देहांत हो गया। उसे दुःख तो हुआ, लेकिन कृष्ण की सीख ने उसके मन को शांत रखा।
जीवन का सत्य यही है कि मृत्यु अवश्यंभावी है। जो व्यक्ति इस सत्य को स्वीकार कर लेता है, वह दुःख में डूबने के बजाय जीवन को समझदारी और संतुलन के साथ जीना सीख जाता है।
