
■ सूर्यकांत उपाध्याय
एक बार एक संत कहीं प्रवचन दे रहे थे। अपना प्रवचन समाप्त करते हुए उन्होंने अंत में कहा, “जागो, समय हाथ से निकला जा रहा है।” सभा विसर्जित होने के बाद उन्होंने अपने शिष्य से कहा, “चलो वत्स! थोड़ी दूर घूमकर आते हैं।” गुरु-शिष्य साथ चल दिए। अभी वे पंडाल के मुख्य द्वार तक ही पहुँचे थे कि एक किनारे रुककर खड़े हो गए।
प्रवचन सुनने आए लोग एक-एक करके बाहर निकल रहे थे, इसलिए वहाँ भीड़-सी हो गई थी। अचानक उसी भीड़ में से निकलकर एक स्त्री संत से मिलने आई।
उस स्त्री ने कहा, “मैं एक नर्तकी हूँ। आज नगर सेठ के घर मेरे नृत्य का कार्यक्रम पहले से तय था, लेकिन मैं उसके बारे में भूल चुकी थी। आपने कहा, ‘समय निकला जा रहा है’, तो मुझे तुरंत इस बात की याद आ गई।”
उसके बाद एक डकैत संत की ओर आया।
उस डकैत ने कहा, “मैं आपसे कोई बात नहीं छिपाऊँगा। मैं भूल गया था कि आज मुझे एक जगह डाका डालने जाना था। जैसे ही आपने कहा, ‘समय निकला जा रहा है’, यह सुनते ही मुझे अपनी योजना याद आ गई। आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।”
उसके जाने के बाद धीरे-धीरे चलता हुआ एक बूढ़ा व्यक्ति संत के पास आया।
वृद्ध ने आकर कहा, “जिंदगी भर दुनियादारी की चीजों के पीछे भागता रहा। अब मौत का सामना करने का दिन नजदीक आता जा रहा है, तब मुझे लगता है कि सारी जिंदगी यूँ ही बेकार चली गई। आपकी बातों से आज मेरी आँखें खुल गईं। आज से मैं दुनियादारी का मोह छोड़कर भगवान् का भजन करना चाहता हूँ।”
जब सब लोग चले गए तो संत ने शिष्य से कहा, “देखो, प्रवचन मैंने एक ही दिया, लेकिन उसका अर्थ सबने अलग-अलग निकाला। जिसकी जितनी झोली होती है, उतना ही दान वह समेट पाता है। भगवान् की प्राप्ति के लिए भी मन की झोली उसके योग्य होनी चाहिए। इसके लिए मन का शुद्ध होना बहुत जरूरी है।”
