
● मुंबई
देश में आपराधिक मामलों की जांच प्रक्रिया तेजी से डिजिटल हो रही है, जिसके चलते चार्जशीट का आकार और जटिलता लगातार बढ़ती जा रही है। इसी के चलते अब जेलों में बंद अंडरट्रायल आरोपी अदालतों से कंप्यूटर या लैपटॉप इस्तेमाल करने की अनुमति मांग रहे हैं, ताकि वे अपने खिलाफ पेश डिजिटल सबूतों को समझ सकें।
2006 के मुंबई सीरियल ट्रेन ब्लास्ट मामले में आरोपियों को 10,000 से अधिक पन्नों की चार्जशीट रखने के लिए अदालत से विशेष अनुमति लेनी पड़ी थी। उस समय आर्थर रोड जेल में जगह की कमी बड़ी समस्या थी। अब, करीब दो दशक बाद, चार्जशीट और भी ज्यादा लंबी हो गई हैं और उनका बड़ा हिस्सा डिजिटल फॉर्म में है।
मालेगांव 2008 ब्लास्ट केस और एलगार परिषद केस जैसे मामलों में अदालतों ने कुछ आरोपियों को सीमित शर्तों के साथ कंप्यूटर इस्तेमाल की इजाजत दी है। यह अनुमति सुरक्षा और निगरानी के तहत दी जाती है, ताकि किसी तरह का दुरुपयोग न हो।
इस बदलाव के पीछे एक बड़ा कारण नई कानूनी व्यवस्था भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता है, जिसके तहत तलाशी और जब्ती की प्रक्रिया की वीडियो रिकॉर्डिंग अनिवार्य कर दी गई है। इससे इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की मात्रा काफी बढ़ गई है।
