■ सूर्यकांत उपाध्याय

एक पार्टी में, जहाँ कई मशहूर हस्तियाँ मौजूद थीं, एक बुज़ुर्ग महिला छड़ी के सहारे मंच पर आईं और अपनी सीट पर बैठ गईं।
होस्ट ने पूछा, “क्या आप अब भी अक्सर डॉक्टर के पास जाती हैं?”
बुज़ुर्ग महिला बोलीं, “हाँ, मैं तो अक्सर जाती हूँ!”
होस्ट ने पूछा, “क्यों?”
बुज़ुर्ग महिला मुस्कराकर बोलीं, “मरीज़ों को तो डॉक्टर के पास जाना चाहिए, तभी तो डॉक्टर ज़िंदा रहेगा!”
श्रोता उस बुज़ुर्ग महिला की हाज़िरजवाबी पर तालियों से गूंज उठे।
फिर होस्ट ने पूछा, “तो क्या आप फार्मासिस्ट के पास भी जाती हैं?”
बुज़ुर्ग महिला बोलीं, “ज़रूर! क्योंकि फार्मासिस्ट को भी तो जीना है!”
अबकी बार और ज़्यादा तालियाँ बजीं।
होस्ट ने हँसते हुए पूछा, “तो फिर क्या आप फार्मासिस्ट की दी हुई दवा भी लेती हैं?”
बुज़ुर्ग महिला बोलीं, “नहीं! दवाइयाँ तो मैं अक्सर फेंक देती हूँ… मुझे भी तो जीना है!”
इस पर तो पूरा हॉल ठहाकों से गूंज उठा।
अंत में होस्ट ने कहा, “आपका धन्यवाद कि आप इस इंटरव्यू में आईं।”
बुज़ुर्ग महिला बोलीं, “आपका स्वागत है! मुझे मालूम है, आपको भी तो जीना है!”
श्रोता इतने हँसे कि देर तक तालियाँ बजती रहीं।
फिर एक और सवाल हुआ, “क्या आप अपने व्हाट्सएप ग्रुप में भी सक्रिय रहती हैं?”
बुज़ुर्ग महिला बोलीं, “हाँ, बीच-बीच में संदेश भेजती रहती हूँ, ताकि सबको लगे कि मैं ज़िंदा हूँ! वरना सब समझेंगे कि मैं चली गई और ग्रुप एडमिन मुझे हटा देगा!”
कहते हैं, यह चुटकुला दुनिया के सबसे मज़ेदार चुटकुलों में से एक माना गया, क्योंकि सबको जीना है!
प्यारे दोस्तों, मुस्कुराते रहिए, संदेश भेजते रहिए और अपनों से जुड़े रहिए!
