■ सूर्यकांत उपाध्याय

पांडवों के वनवास का कठिन समय चल रहा था। अर्जुन मणिपुर की शांत पहाड़ियों में एकांत तपस्या कर रहे थे। चारों ओर गहरा सन्नाटा था। केवल हवाओं की सरसराहट और पक्षियों का मधुर कलरव सुनाई दे रहा था।
अचानक वातावरण का स्पंदन बदल गया। अर्जुन ने आँखें खोलीं तो उनके सामने एक अद्भुत जीव खड़ा था। वह ‘नवगुंजरा’ था, नौ विभिन्न प्राणियों के अंगों से बना दिव्य स्वरूप। उसका मस्तक मुर्गे जैसा, गर्दन मोर जैसी, पीठ बैल जैसी, कमर सिंह जैसी और पूँछ सर्प की भाँति लहरा रही थी। उसके तीन पैर हाथी, बाघ और घोड़े के थे। सबसे विलक्षण उसका मानवीय हाथ था, जिसमें एक खिला हुआ कमल था।
अर्जुन ने पहले उसे किसी मायावी राक्षस का रूप समझा और गांडीव उठा लिया। किंतु जब उन्होंने उसकी आँखों में देखा, तो वहाँ क्रोध नहीं, अपार शांति थी। अर्जुन को अनुभव हुआ कि यह कोई साधारण जीव नहीं, बल्कि स्वयं ईश्वर का संकेत है। उन्होंने तुरंत धनुष नीचे रख दिया और श्रद्धा से नतमस्तक हो गए। उसी क्षण नवगुंजरा अंतर्ध्यान हो गया और भगवान श्रीकृष्ण प्रकट हुए।
● शिक्षा व सूचना
यह कथा हमें सिखाती है कि ईश्वर केवल एक रूप में नहीं बल्कि संपूर्ण सृष्टि में विद्यमान हैं। ओडिशा की ‘पट्टचित्र’ कला और मंदिरों की नक्काशी में नवगुंजरा आज भी आस्था और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक माना जाता है।
