■ सूर्यकांत उपाध्याय

एक पुराने खंडहर के बीच से भेड़ों का एक झुंड रास्ता पार कर रहा था।
टूटी दीवारें, बिखरे पत्थर और बीच रास्ते में एक रस्सी बंधी हुई थी।
रस्सी बहुत ऊँची नहीं थी, पर इतनी भी छोटी नहीं थी कि उसे अनदेखा किया जा सके।
अब दृश्य दिलचस्प था।
कुछ भेड़ें आईं –
बिना ज़्यादा सोचे-समझे सीधे रस्सी के ऊपर से फांद गईं।
उनका तरीका साफ था –
‘रुकना नहीं, बस छलांग लगाओ!’
कुछ दूसरी भेड़ें आईं – उन्होंने झुककर रस्सी के नीचे से निकलना बेहतर समझा।
उनका अंदाज़ अलग था –
‘क्यों कूदना? झुको और निकल जाओ।’
तभी दो भेड़ें रुकीं। एक छोटी थी और दूसरी सबसे वरिष्ठ।
छोटी भेड़ ने रस्सी को देखा, फिर वरिष्ठ भेड़ की ओर निहारा, कुछ समझा…
और फिर अपने सिर से रस्सी को किनारे खिसका दिया।
रस्सी हट गई।
अब रास्ता सबके लिए खुल गया।
सबसे अंत में वह बुजुर्ग, वरिष्ठ भेड़ आई।
न उसने छलांग लगाई…
न झुककर निकली…
न रस्सी हटाई…
वह आराम से सीधे चलती हुई पार हो गई क्योंकि समस्या अब थी ही नहीं।
अब इस प्रसंग को समझिए।
यही जीवन है।
कुछ लोग हर मुश्किल को ताकत से पार करते हैं।
कुछ लोग लचीलापन अपनाते हैं।
कुछ लोग समस्या की जड़ को ही हटा देते हैं।
और कुछ लोग अनुभव के आधार पर प्रतीक्षा करते हैं क्योंकि उन्हें पता होता है कि हर बाधा स्थायी नहीं होती।
सवाल यह नहीं है कि तरीका कौन-सा सही है।
सवाल यह है कि आप परिस्थिति को समझकर कौन-सा तरीका चुनते हैं।
