■ सूर्यकांत उपाध्याय

अजय स्कूल से घर लौटा तो लिफ्ट में उसकी मुलाकात पड़ोसी राकेश से हुई। राकेश ने खुशी-खुशी जेब से नया iPhone निकालकर दिखाया। उसने कहा, ‘आज पापा ने मुझे यह दिलाया है।’ फिर हंसते हुए बोला, ‘आजकल जिसके पास iPhone नहीं होता, लोग उसे गरीब समझते हैं।’
राकेश की बात अजय के मन में बैठ गई। घर पहुंचते ही वह उदास होकर अपने कमरे में चला गया। अजय के पिता संतोष जी एक निजी कंपनी में नौकरी करते थे। उनकी अधिकांश आय फ्लैट और गाड़ी की ईएमआई में चली जाती थी। परिवार का खर्च किसी तरह चलता था।
मां राधिका जी ने पूछा, ‘क्या बात है बेटा?’
अजय बोला, ‘मेरे सभी दोस्तों के पास iPhone है। अगर हमें साधारण जीवन ही जीना था, तो इस सोसायटी में आने की क्या जरूरत थी?’
राधिका जी ने समझाया, ‘बेटा, यह घर और बाकी जिम्मेदारियां बड़ी मुश्किल से संभल रही हैं। हर इच्छा तुरंत पूरी नहीं की जा सकती।’
लेकिन अजय नहीं माना। शाम को जब संतोष जी घर आए तो उन्होंने भी उसे समझाया कि अभी iPhone खरीदना संभव नहीं है। इससे अजय और नाराज हो गया।
कुछ दिनों बाद अजय घर छोड़कर मुंबई चला गया। उसने एक पत्र छोड़ दिया था, जिसमें लिखा था कि वह कुछ बनकर ही वापस लौटेगा।
मुंबई पहुंचकर वह एक होटल में खाना खाने गया। वहां एक दुबला-पतला अधेड़ व्यक्ति उसे खाना परोस रहा था। खाना खाने के बाद अजय ने होटल मालिक से कहा, ‘इतने कमजोर आदमी को काम पर क्यों रखा है?’
होटल मालिक ने गंभीर स्वर में कहा, ‘यह कभी बहुत अमीर परिवार का बेटा था। करीब बीस साल पहले घरवालों से नाराज होकर घर छोड़ आया था। अच्छी नौकरी नहीं मिली, तो यहीं काम करने लगा। जब वापस घर गया, तब तक उसके माता-पिता उसकी प्रतीक्षा करते-करते दुनिया छोड़ चुके थे। रिश्तेदार संपत्ति पर कब्जा कर चुके थे। तब से यह यहीं काम कर रहा है और अपनी गलती पर पछता रहा है।’
यह सुनकर अजय सन्न रह गया। उसे अपने माता-पिता का चेहरा याद आ गया। उसने तुरंत पिता को फोन किया और कहा, ‘पापा, मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई। मैं कल घर लौट रहा हूं।’
फोन रखने के बाद अजय ने राहत की सांस ली। उसे समझ आ गया था कि माता-पिता का प्रेम किसी महंगे मोबाइल या दिखावे से कहीं अधिक मूल्यवान होता है। जीवन का वह सबक, जो समझाने से नहीं मिला था, उसे एक अनुभव ने सिखा दिया।
