@सूर्यकांत उपाध्याय

एक दिन मीरा ने भोजराज से कहा, “आपकी आज्ञा हो तो एक निवेदन करूँ।”
क्यों नहीं? फरमाइए,” भोजराज ने विनम्रतापूर्वक कहा।
“मेड़ते में तो संत आते ही रहते थे। वहाँ सत्संग मिलता था। प्रभु के प्रेमियों के मुख से झरती उनकी रूप-गुण-सुधा की वाणी से सुख मिलता था; वह जोशीजी के सुख से पुराणकथा सुनने में नहीं मिलता। यहाँ सत्संग का भाव मुझे सदा अनभिज्ञ है।” भोजराज गंभीर हुए।
“यहाँ महलों में संतों के प्रवेश की अनुमति नहीं है। हाँ, किले में संत महात्मा आते रहते हैं, किन्तु आपका बाहर पधारना कैसे हो सकता है?”
“सत्संग बिना तो प्राण तृषित (प्यासे) मर जाते हैं,” मीरा ने उदास स्वर में कहा।”
ऐसा करते हैं—कुम्भ श्याम के मंदिर के पास एक और मंदिर बनवा देते हैं। वहाँ आप नित्य दर्शन को आ सकती हैं। मैं भी प्रयत्न करूँगा कि गढ़ में आने वाले संत वहाँ पहुँचें। इस प्रकार मैं भी संतदर्शन कर लाभ पा सकूँगा और थोड़ा-बहुत ज्ञान भी मिलेगा।”
“जैसा आप उचित समझें,” मीरा ने प्रसन्नता से कहा। महाराणा के आदेश होते ही मंदिर का निर्माण आरंभ हो गया। अंतःपुर में नए मंदिर के निर्माण की चर्चा छिड़ गई।
“महल में स्थान की कमी थी क्या?”
“यह बाहर मंदिर क्यों बन रहा है?”
“अब पूजा और गाना-बजाना खुले में होगा?”
“सिसौदियों का विजयध्वज तो फहरा रहा है; अब भक्ति का ध्वज फहराने के लिए यह भक्ति-स्तम्भ बन रहा है।”
बहरहाल, बातें बहुत थीं। मंदिर बनकर शुभ मुहूर्त में प्राण-प्रतिष्ठा हुई। धीरे-धीरे सत्संग की धारा बह चली। साथ ही मीरा का यश भी शीत की सुनहरी धूप-सा फैलने लगा। जब मीरा मंदिर पधारतीं, उनके भजन और ज्ञान-वार्ता सुनने भक्तों व संतों का मेला लगने लगा। बाहर से आने वाले संतों के भोजन, आवास और अन्य आवश्यकताओं की व्यवस्था भोजराज की आज्ञा से जोशी जी करते। महाराणा गुप्तचरों से मंदिर की गतिविधियों की बातें बड़े चाव से सुनते।
कभी-कभी वे सोचते, “बड़ा होना भी कितना दुखदायी है। यदि मैं महाराणा या मीरा का ससुर न होता, बल्कि कोई साधारण जन होता, तो सबके बीच बैठकर सत्संग- सुधा मैं भी निसंकोच पान करता। मैं तो ऐसा भाग्यहीन हूँ कि वेश बदलने पर भी पहचान लिया जाऊँगा।”
जैसे-जैसे बाहर मीरा का यश बढ़ा, राजकुल की स्त्रियाँ उनकी निन्दा में उतनी ही मुखर हो उठीं। किन्तु मीरा इन सब बातों से बेखबर, अपने पथ पर दृढ़तापूर्वक अग्रसर रहीं। उन्हें ज्ञात होता भी तो कैसे?
भोजराज सचमुच उनकी ढाल बन बैठे; परिवार के क्रोध और आपत्तियों के भाले वे अपनी छाती पर सहते रहे।
“मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरों न हो कोय…”—
