▪️ सूर्यकांत उपाध्याय

सुनसान जंगल में एक लकड़हारे से पानी का लोटा पीकर प्रसन्न हुए राजा ने कहा, “हे भाई! किसी दिन मेरी राजधानी में अवश्य आना, मैं तुम्हें पुरस्कार दूँगा।”
लकड़हारे ने कहा, “बहुत अच्छा।”
एक दिन लकड़हारा घूमते-फिरते राजधानी पहुँच गया। राजा ने उसे देखा और अत्यन्त प्रसन्न होकर अपने पास बिठा लिया। फिर सोचने लगा, “इस निर्धन व्यक्ति का दुःख कैसे दूर करूँ?”
बहुत विचार करने के बाद राजा ने चन्दन का एक विशाल उद्यान उसे सौंप दिया। लकड़हारा भी मन ही मन प्रसन्न हो गया। उसने सोचा, “चलो, अच्छा हुआ। इस बाग के वृक्षों से बहुत-सा कोयला बन जाएगा और मेरा जीवन आराम से कट जाएगा।”
यह सोचकर वह प्रतिदिन चन्दन के पेड़ काटकर उनका कोयला बनाने लगा और उसे बेचकर अपना गुज़ारा करने लगा।
कुछ ही समय में चन्दन का सुन्दर बगीचा उजाड़ हो गया। जगह-जगह कोयले के ढेर लगे थे। अब वहाँ केवल कुछ ही वृक्ष बचे थे, जो लकड़हारे को छाया प्रदान करते थे।
एक दिन राजा के मन में विचार आया, “चलो, लकड़हारे का हालचाल भी जान लिया जाए और चन्दन के उद्यान का भ्रमण भी हो जाएगा।”
यह सोचकर राजा उद्यान की ओर चल पड़ा।
दूर से ही उसने उद्यान से धुआँ उठते देखा। पास पहुँचने पर ज्ञात हुआ कि चन्दन की लकड़ियाँ जल रही हैं और लकड़हारा वहीं खड़ा है। राजा को आते देखकर लकड़हारा उसके स्वागत के लिए आगे बढ़ा।
राजा ने आश्चर्य से पूछा, “भाई! यह तुमने क्या कर डाला?”
लकड़हारे ने उत्तर दिया, “महाराज! आपकी कृपा से मेरा इतना समय आराम से कट गया। आपने यह उद्यान देकर मेरा बड़ा उपकार किया। मैं चन्दन का कोयला बनाकर बेचता रहा हूँ। अब तो केवल कुछ ही वृक्ष शेष बचे हैं। यदि कोई और ऐसा उद्यान मिल जाए, तो मेरा शेष जीवन भी आराम से व्यतीत हो जाएगा।”
राजा मुस्कुराया और बोला, “अच्छा, मैं यहीं खड़ा रहता हूँ। तुम कोयला बनाने के बजाय इस लकड़ी का एक टुकड़ा बाजार में ले जाकर बेचकर आओ।”
लकड़हारे ने लगभग दो गज लंबी चन्दन की लकड़ी उठाई और बाजार में ले गया। चन्दन की लकड़ी देखकर लोग उसे खरीदने के लिए उमड़ पड़े। अंततः वह लकड़ी तीन सौ रुपये में बिकी, जो उसके द्वारा बनाए गए कोयले की कीमत से कई गुना अधिक थी।॥
