▪️ सूर्यकांत उपाध्याय

8 वर्ष का एक बच्चा एक रुपए का सिक्का मुट्ठी में लेकर एक दुकान पर गया और पूछने लगा, ‘क्या आपकी दुकान में ईश्वर मिलेंगे?’
दुकानदार ने यह बात सुनकर सिक्का नीचे फेंक दिया और बच्चे को भगा दिया।
बच्चा पास की दूसरी दुकान पर गया और एक रुपए का सिक्का लेकर चुपचाप खड़ा हो गया।
‘ए लड़के, एक रुपए में तुम क्या चाहते हो?’ दुकानदार ने पूछा।
बच्चे ने कहा, ‘मुझे ईश्वर चाहिए। क्या आपकी दुकान में मिलेंगे?’
दूसरे दुकानदार ने भी उसे भगा दिया।
लेकिन उस अबोध बालक ने हार नहीं मानी। वह एक दुकान से दूसरी, दूसरी से तीसरी दुकान पर जाता रहा। इस प्रकार लगभग चालीस दुकानों के चक्कर काटने के बाद वह एक वृद्ध दुकानदार के पास पहुंचा।
वृद्ध दुकानदार ने पूछा, ‘तुम ईश्वर को क्यों खरीदना चाहते हो? उनका क्या करोगे?’
पहली बार किसी दुकानदार के मुंह से यह प्रश्न सुनकर बच्चे के चेहरे पर आशा की किरण चमक उठी। उसे लगा कि शायद इसी दुकान पर ईश्वर मिल जाएंगे।
बच्चे ने उत्साह से उत्तर दिया, ‘इस दुनिया में मां के अलावा मेरा कोई नहीं है। मेरी मां दिनभर काम करके मेरे लिए खाना लाती हैं। वे अब अस्पताल में हैं। यदि मेरी मां मर गईं, तो मुझे कौन खिलाएगा? डॉक्टर ने कहा है कि अब सिर्फ ईश्वर ही मेरी मां को बचा सकते हैं। क्या आपकी दुकान में ईश्वर मिलेंगे?’
वृद्ध दुकानदार मुस्कुराए और बोले, ‘हां, मिलेंगे। तुम्हारे पास कितने पैसे हैं?’
‘सिर्फ एक रुपया।’
‘कोई दिक्कत नहीं। एक रुपए में भी ईश्वर मिल सकते हैं।’
दुकानदार ने बच्चे के हाथ से एक रुपया लिया। उनके पास बेचने के लिए एक गिलास पानी के अलावा कुछ नहीं था। उन्होंने फिल्टर से एक गिलास पानी भरकर बच्चे को दिया और कहा, ‘यह पानी अपनी मां को पिला देना। वे ठीक हो जाएंगी।’
अगले दिन कुछ चिकित्सा विशेषज्ञ उस अस्पताल में पहुंचे। बच्चे की मां का ऑपरेशन हुआ और शीघ्र ही वे स्वस्थ हो गईं।
जब अस्पताल से छुट्टी मिलने लगी, तब बिल देखकर महिला के होश उड़ गए। डॉक्टर ने उन्हें आश्वस्त करते हुए कहा, ‘चिंता की कोई बात नहीं है। एक वृद्ध सज्जन आपके सारे बिल चुका गए हैं। उन्होंने आपके लिए एक चिट्ठी भी छोड़ी है।’
महिला ने चिट्ठी खोली। उसमें लिखा था-
‘मुझे धन्यवाद देने की कोई आवश्यकता नहीं है। आपको तो स्वयं ईश्वर ने ही बचाया है। मैं तो केवल एक माध्यम हूं। यदि आप धन्यवाद देना ही चाहती हैं, तो अपने उस अबोध बच्चे को दीजिए, जो सिर्फ एक रुपया लेकर ईश्वर को ढूंढने निकल पड़ा। उसके मन में यह अटूट विश्वास था कि केवल ईश्वर ही आपको बचा सकते हैं। विश्वास इसी को कहते हैं। ईश्वर को पाने के लिए करोड़ों रुपए दान करने की आवश्यकता नहीं होती। यदि मन में अटूट श्रद्धा और विश्वास हो, तो वे एक रुपए में भी मिल सकते हैं।’
