▪️ सूर्यकांत उपाध्याय

पांडवों में प्रत्येक भाई अपनी किसी न किसी विशिष्ट विशेषता के लिए प्रसिद्ध था। युधिष्ठिर धर्म के प्रतीक थे, भीम अद्वितीय बल के धनी थे, अर्जुन अनुपम धनुर्धर थे और नकुल अपने सौंदर्य के लिए विख्यात थे। किंतु सबसे छोटे भाई सहदेव के पास एक ऐसी दिव्य शक्ति थी, जो उन्हें सबसे अलग बनाती थी। वे त्रिकालदर्शी थे अर्थात भूत, वर्तमान और भविष्य का ज्ञान रखते थे।
यह शक्ति उन्हें किसी वरदान से नहीं, बल्कि अपने पिता महाराज पाण्डु की अंतिम इच्छा पूरी करने के कारण प्राप्त हुई थी। जब पाण्डु मृत्यु के निकट थे, तब उन्हें इस बात का गहरा दुःख था कि उनका अर्जित ज्ञान उनके साथ ही समाप्त हो जाएगा। समय कम होने के कारण उन्होंने अपने पुत्रों के सामने एक अत्यंत कठिन प्रस्ताव रखा। उन्होंने कहा कि जो भी उनके मस्तिष्क का मरणोपरांत भक्षण करेगा, उसे उनका समस्त ज्ञान प्राप्त हो जाएगा।
पिता की यह विचलित कर देने वाली बात सुनकर अन्य पांडव संकोच और भय में पड़ गए। किसी में भी ऐसा करने का साहस नहीं था। पिता को अंतिम क्षणों में दुःखी और निराश देखकर सहदेव ने कठिन निर्णय लिया और उनकी आज्ञा का पालन किया।
कथाओं के अनुसार, जैसे ही सहदेव ने उस ज्ञान-पुंज (मस्तिष्क) के तीन भाग ग्रहण किए, उनके लिए ज्ञान के तीन द्वार खुल गए।
पहला भाग: उन्हें अतीत (भूतकाल) की प्रत्येक घटना का ज्ञान हो गया।
दूसरा भाग: उन्हें वर्तमान की प्रत्येक हलचल का बोध होने लगा।
तीसरा भाग: उनके सामने भविष्य (आने वाले समय) का संपूर्ण चित्र स्पष्ट हो गया।
इस प्रकार सहदेव अल्पायु में ही संसार के महान ज्ञानी और भविष्यद्रष्टा बन गए।
भविष्य का ज्ञान होने के कारण सहदेव भली-भाँति जानते थे कि आगे चलकर एक भीषण युद्ध होगा, जिसमें उनके पूरे कुल का विनाश हो जाएगा। फिर भी उन्होंने किसी को आगाह क्यों नहीं किया? इसके पीछे दो प्रमुख कारण बताए जाते हैं।
- भगवान श्रीकृष्ण का निर्देश
ब्रह्मांड में सहदेव के अतिरिक्त केवल भगवान श्रीकृष्ण ही इस महाविनाश से पूर्णतः परिचित थे। वे जानते थे कि पृथ्वी पर बढ़ते अधर्म का अंत करने और धर्म की पुनः स्थापना के लिए यह युद्ध अनिवार्य था। इसलिए उन्होंने सहदेव को मौन रहने का निर्देश दिया।
- मृत्यु का श्राप
कुछ ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि श्रीकृष्ण ने सहदेव के लिए एक कठोर मर्यादा निर्धारित की थी। यदि वे भविष्य में होने वाली किसी भी घटना का रहस्य किसी के सामने प्रकट करते, तो उसी क्षण उनकी मृत्यु हो जाती।
सहदेव स्वयं भी समझ चुके थे कि नियति के विधान को बदलना न उचित है और न ही संभव। यही कारण था कि महाविनाश को सामने देखते हुए भी वे धर्म की स्थापना के लिए जीवनभर मौन रहे।
- टिप्पणी: यह कथा लोकप्रचलित मान्यताओं पर आधारित है। महाभारत के मूल ग्रंथ में सहदेव द्वारा पाण्डु के मस्तिष्क का भक्षण कर त्रिकालज्ञान प्राप्त करने का प्रसंग स्पष्ट रूप से वर्णित नहीं मिलता; यह विवरण मुख्यतः बाद की लोककथाओं और क्षेत्रीय परंपराओं में मिलता है।
