▪️ सूर्यकांत उपाध्याय

एक बार एक किसान जंगल में लकड़ियाँ बीनने गया। वहाँ उसने एक अद्भुत दृश्य देखा। एक लोमड़ी के दो पैर नहीं थे, फिर भी वह खुशी-खुशी घिसटकर चल रही थी।
किसान ने सोचा, ‘यह कैसे जीवित रहती होगी, जबकि यह कोई शिकार भी नहीं पकड़ सकती?’
तभी उसने देखा कि एक शेर अपने दाँतों में शिकार दबाए उसी दिशा में आ रहा है। सभी जानवर भागने लगे। किसान भी डरकर एक पेड़ पर चढ़ गया। उसने देखा कि शेर उस लोमड़ी के पास आया। उसे खाने के बजाय उसने प्यार से अपने शिकार का थोड़ा-सा हिस्सा उसके सामने रख दिया और वहाँ से चला गया।
अगले दिन भी किसान ने देखा कि शेर उसी प्रकार लोमड़ी के लिए भोजन लाया और उसे खिलाकर चला गया। यह अद्भुत दृश्य देखकर किसान ने मन ही मन भगवान को प्रणाम किया। उसे विश्वास हो गया कि भगवान जिसे जन्म देते हैं, उसके भोजन का भी प्रबंध कर देते हैं।
यह सोचकर वह भी एक निर्जन स्थान पर जाकर बैठ गया और भोजन मिलने की प्रतीक्षा करने लगा। कई दिन बीत गए, पर कोई नहीं आया। अंततः वह भूख से मरणासन्न होकर वहाँ से लौटने लगा।
रास्ते में उसे एक विद्वान महात्मा मिले। उन्होंने उसे भोजन और पानी कराया। तब किसान उनके चरणों में गिर पड़ा और लोमड़ी की पूरी घटना सुनाकर बोला, ‘महाराज! भगवान ने उस अपंग लोमड़ी पर दया की, पर मैं तो मरते-मरते बचा। ऐसा क्यों हुआ? क्या भगवान मुझ पर इतने निर्दयी हो गए?’
महात्मा ने किसान के सिर पर हाथ फेरते हुए मुस्कुराकर कहा, ‘वत्स, तुम भगवान का संकेत ही नहीं समझ पाए। इसलिए तुम्हें यह कष्ट उठाना पड़ा। तुमने यह क्यों नहीं समझा कि भगवान तुम्हें उस शेर की तरह दूसरों की सहायता करने वाला बनाना चाहते थे, न कि उस निरीह लोमड़ी की तरह दूसरों पर आश्रित रहने वाला।’
