
▪️मुंबई
दक्षिण-पश्चिम मानसून के बादलों पर किए गए एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक अध्ययन में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। शोधकर्ताओं ने पाया है कि वर्षा वाले बादलों में रिफ्रैक्टरी ब्लैक कार्बन (कालिख के अत्यंत सूक्ष्म कण) मौजूद हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि इन कणों की मात्रा लगातार बढ़ती रही, तो यह बादलों के बनने और वर्षा की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है।
यह अध्ययन भारतीय उष्णदेशीय मौसम विज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों ने किया। इसके लिए उन्होंने हवा के साथ-साथ बादलों की जल बूंदों के नमूनों का विश्लेषण किया। अध्ययन में सामने आया कि ब्लैक कार्बन ऊष्मा को तेजी से अवशोषित करता है। इससे स्थानीय तापमान बढ़ जाता है और जब ये गर्म कण बादलों के भीतर पहुंचते हैं, तो छोटी-छोटी जल बूंदें वर्षा की बूंदों में बदलने के बजाय वाष्पित होने लगती हैं। इस प्रक्रिया को वैज्ञानिक सेमी-डायरेक्ट इफेक्ट कहते हैं।
शोध के अनुसार, यदि वातावरण में ब्लैक कार्बन का स्तर बढ़ता रहा तो बादलों के विकास में बाधा आ सकती है और कई क्षेत्रों में वर्षा की मात्रा घटने की आशंका भी पैदा हो सकती है। वैज्ञानिकों ने यह भी पाया कि बादलों की निचली परत के आसपास ब्लैक कार्बन की सांद्रता सबसे अधिक दर्ज की गई।
विशेषज्ञों का कहना है कि ब्लैक कार्बन मुख्यतः वाहनों से निकलने वाले धुएं, औद्योगिक उत्सर्जन, जैव ईंधन और अन्य अपूर्ण दहन प्रक्रियाओं से उत्पन्न होता है। ऐसे में वायु प्रदूषण पर प्रभावी नियंत्रण केवल स्वास्थ्य के लिए ही नहीं, बल्कि मानसून और वर्षा के संतुलन के लिए भी अत्यंत आवश्यक है।
