▪️ सूर्यकांत उपाध्याय

दक्षिण भारत के विद्यानगर में एक धनी वृद्ध ब्राह्मण और एक गरीब, धर्मनिष्ठ युवक रहते थे। एक दिन वृद्ध ब्राह्मण ने तीर्थयात्रा का निश्चय किया और युवक को साथ चलने के लिए कहा। यात्रा के दौरान वृद्ध गंभीर रूप से बीमार पड़ गए। युवक ने दिन-रात उनकी निस्वार्थ सेवा की और उन्हें स्वस्थ कर दिया।
वृंदावन पहुंचकर कृतज्ञ वृद्ध ब्राह्मण ने भगवान गोपाल के समक्ष अपनी इकलौती पुत्री का विवाह उस युवक से करने का वचन दिया। युवक ने कहा कि भविष्य में विवाद न हो, इसलिए भगवान को साक्षी मानकर प्रतिज्ञा करें। ब्राह्मण ने ऐसा ही किया।
घर लौटने पर परिवार के दबाव में ब्राह्मण अपने वचन से मुकर गए। पंचायत में भी उन्होंने वादा करने से इनकार कर दिया। जब युवक से गवाह मांगा गया, तो उसने कहा, ‘मेरे गवाह स्वयं वृंदावन के गोपाल हैं।’
युवक वृंदावन पहुंचा और भगवान से सत्य की रक्षा की प्रार्थना की। उसकी अटूट भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान गोपाल ने साथ चलने की स्वीकृति दी। उन्होंने शर्त रखी कि वे पीछे-पीछे चलेंगे और युवक कभी पीछे मुड़कर नहीं देखेगा। यात्रा के अंत में नूपुरों की ध्वनि बंद होने पर युवक से धैर्य न रहा और वह पीछे मुड़ गया। उसी क्षण भगवान वहीं स्थिर हो गए, पर बोले, ‘अब गांव वालों को यहीं बुला लाओ।’
जब पूरा गांव वहां पहुंचा, तब भगवान ने सबके सामने कहा कि वृद्ध ब्राह्मण ने वास्तव में अपनी पुत्री का विवाह इस युवक से करने का वचन दिया था। सत्य प्रकट होते ही ब्राह्मण ने अपनी भूल स्वीकार की और अपनी पुत्री का विवाह युवक से कर दिया।
जहां भगवान स्थिर हुए, वहीं प्रसिद्ध साक्षी गोपाल मंदिर की स्थापना हुई। यह
▪️ सीख : कथा सिखाती है कि सच्ची श्रद्धा, निस्वार्थ सेवा और सत्य के प्रति अडिग विश्वास से भगवान भी भक्त के लिए स्वयं साक्षी बन जाते हैं।
