▪️सूर्यकांत उपाध्याय

प्राचीन काल में हिमालय की कंदराओं में एक महान तपस्वी ऋषि कठोर तपस्या कर भगवान शिव को प्रसन्न करने में लीन थे। उनकी तपस्या का तेज इतना प्रबल था कि देवराज इंद्र सहित सभी देवता चिंतित हो उठे। इंद्र और बाद में ब्रह्माजी ने उन्हें वरदान देने का प्रयास किया, किंतु ऋषि ने किसी भी प्रकार का वर स्वीकार करने से इनकार कर दिया। इससे देवताओं को भय हुआ कि कहीं उनका तपोबल भविष्य में देवलोक के लिए संकट न बन जाए।
अंततः देवता भगवान शिव की शरण में पहुंचे और ऋषि की तपस्या रोकने का आग्रह किया। शिव ने पहले उन्हें समझाया, किंतु देवताओं के बार-बार अनुरोध पर एक दिन, जब ऋषि आश्रम से बाहर थे, उन्होंने उनकी कुटिया और आश्रम को भस्म कर दिया।
लौटने पर अपना आश्रम नष्ट देखकर ऋषि अत्यंत क्रोधित हुए। बिना यह जाने कि यह कार्य किसने किया है, उन्होंने श्राप दिया कि जिसने भी उनके पावन आश्रम को नष्ट किया है, उसका शरीर अग्नि के समान जलने लगे। ऋषि के तपोबल से दिया गया श्राप तत्काल प्रभावी हुआ और स्वयं भगवान शिव का शरीर भीषण जलन से व्याकुल हो उठा। गंगाजल और अन्य उपाय भी निष्फल रहे।
जब भगवान नारायण को इसका पता चला, तो उन्होंने कामधेनु माता को शिवजी के पास भेजा। कामधेनु ने श्रद्धापूर्वक भगवान शिव का दुग्धाभिषेक किया। दूध की शीतल धाराओं से श्राप की अग्नि शांत हो गई और महादेव पूर्णतः स्वस्थ हो गए।
इससे प्रसन्न होकर भगवान शिव ने वरदान दिया कि जो भी भक्त श्रद्धा से उनका दुग्धाभिषेक, दधिअभिषेक या घृताभिषेक करेगा, उसकी मनोकामनाएं पूर्ण होंगी। तभी से शिवलिंग पर दूध अर्पित करने की परंपरा प्रचलित मानी जाती है।
▪️यद्यपि विभिन्न पुराणों और शैव परंपराओं में दुग्धाभिषेक के कारणों का वर्णन अलग-अलग रूपों में मिलता है। इसलिए इसे मुख्यतः धार्मिक आस्था और परंपरा के रूप में ही देखा जाता है।
