▪️ सूर्यकांत उपाध्याय

चारों ओर भीषण प्राकृतिक आपदाओं के बीच भी हिमालय की गोद में स्थित भगवान केदारनाथ का मंदिर अडिग खड़ा रहता है। यह श्रद्धालुओं के लिए भगवान शिव की दिव्य महिमा का प्रतीक माना जाता है।
पुराणों के अनुसार, केदार क्षेत्र अनादि और अत्यंत पवित्र है। भगवान विष्णु के अवतार नर-नारायण बदरिकाश्रम में प्रतिदिन पार्थिव शिवलिंग की पूजा करते थे। उनकी कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए। नर-नारायण ने उनसे यहीं ज्योतिर्लिंग रूप में सदैव विराजमान रहने का वर मांगा, तभी से भगवान ‘केदारेश्वर’ के रूप में प्रतिष्ठित हैं। सत्ययुग में उपमन्यु ऋषि और द्वापर में पांडवों ने भी यहीं तप कर भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त किया।
स्कन्दपुराण में वर्णित कथा के अनुसार, हिरण्याक्ष नामक दैत्य ने इन्द्र से स्वर्ग छीन लिया था। देवताओं की प्रार्थना पर भगवान शिव महिष (भैंसे) का रूप धारण कर प्रकट हुए और ‘के दारयामि?’ अर्थात् ‘किन दैत्यों का संहार करूं?’ कहा। इन्द्र के निर्देश पर शिव ने हिरण्याक्ष सहित पांच दैत्यों का वध किया। इसी प्रसंग से भगवान ‘केदार’ नाम से विख्यात हुए।
इन्द्र ने भगवान से उसी स्थान पर निवास करने की प्रार्थना की। भगवान शिव ने वरदान दिया कि जो भक्त केदारनाथ के दर्शन कर श्रद्धा से यहां के पवित्र जल का आचमन करेगा, उसे महान पुण्य की प्राप्ति होगी। तभी से इन्द्र प्रतिदिन स्वर्ग से आकर भगवान केदारेश्वर की पूजा करते हैं।
मान्यता है कि केदारनाथ की यात्रा, भगवान केदारेश्वर की आराधना तथा उनकी महिमा का श्रद्धापूर्वक श्रवण-मनन करने से पापों का नाश होता है, जीवन में सुख-शांति आती है और अंततः मोक्ष की प्राप्ति होती है।
