▪️सूर्यकांत उपाध्याय

युयुत्सु महाभारत का एक महत्वपूर्ण पात्र था और युद्ध के अंत में जीवित बचे 18 प्रमुख योद्धाओं में शामिल था। वह धृतराष्ट्र का पुत्र था, लेकिन उसकी माता गांधारी नहीं, बल्कि उनकी दासी एवं सखी सुग्धा (या सौवाली) थीं। राजपुत्र होने के बावजूद दासीपुत्र होने के कारण उसे वह सम्मान नहीं मिला, जिसका वह अधिकारी था। महात्मा विदुर की तरह उसने भी जीवनभर इस उपेक्षा का सामना किया।
युयुत्सु का स्वभाव धर्मनिष्ठ और न्यायप्रिय था। वह दुर्योधन की अन्यायपूर्ण नीतियों का समर्थक नहीं था। कथाओं के अनुसार, उसने भीम को विष देने की योजना की सूचना युधिष्ठिर तक पहुँचाई थी तथा द्यूतसभा में द्रौपदी के चीरहरण का विकर्ण के साथ विरोध भी किया।
महाभारत युद्ध प्रारंभ होने से पहले युधिष्ठिर ने घोषणा की कि जो धर्म को पांडवों के पक्ष में मानता हो, वह उनके साथ आ सकता है। तब युयुत्सु ने कौरव पक्ष छोड़कर पांडवों का साथ दिया। इसके बावजूद उसने कभी कौरव सेना के गुप्त रहस्य प्रकट नहीं किए। युद्ध के दौरान उसे मुख्यतः सेना के लिए शस्त्र और रसद की व्यवस्था का दायित्व सौंपा गया, जिसे उसने कुशलतापूर्वक निभाया।
युद्ध के बाद युयुत्सु ने धृतराष्ट्र और गांधारी की सेवा की तथा उनके निधन पर पुत्रधर्म निभाते हुए अंतिम संस्कार किया। युधिष्ठिर के राज्यारोहण के बाद उसे मंत्री बनाया गया। बाद में, जब पांडव स्वर्गारोहण के लिए प्रस्थान कर गए, तब अभिमन्यु-पुत्र परीक्षित के संरक्षक का दायित्व भी युयुत्सु को सौंपा गया। कुछ परंपराओं में हरियाणा और उत्तर भारत के जाट समुदाय को युयुत्सु का वंशज माना जाता है, हालांकि इस मत पर इतिहासकारों में सर्वसम्मति नहीं है।
