▪️ सूर्यकांत उपाध्याय

एक दिन एक युवक जूतों की दुकान पर आया। उम्र कोई 22 वर्ष रही होगी। पहनावे से साधारण, लेकिन चेहरे पर आत्मविश्वास था। दुकानदार की नज़र उसके पैरों पर गई। चमड़े के जूते अच्छी तरह पॉलिश किए हुए थे।
दुकानदार ने पूछा, ‘क्या चाहिए बेटा?’
युवक बोला, ‘माँ के लिए चप्पल चाहिए… लेकिन मजबूत होनी चाहिए।’
‘माँ साथ नहीं आईं? नाप कैसे बताओगे?’
युवक ने धीरे से अपना बटुआ खोला और उसमें से एक मुड़ा हुआ कागज़ निकाला। कागज़ पर उसकी माँ के दोनों पैरों की रूपरेखा बनी हुई थी।
उसकी आँखें भर आईं। वह बोला, ‘साहब, मेरी माँ ने पूरी जिंदगी मजदूरी की है। मुझे पढ़ाने के लिए खुद धूप में नंगे पैर चलीं, लेकिन कभी अपने लिए चप्पल नहीं खरीदी। आज मेरी पहली तनख़्वाह मिली है। घर जा रहा हूँ, तो सोचा माँ के लिए क्या ले जाऊँ? फिर लगा, जिन पैरों ने मेरे लिए इतने कष्ट सहे, सबसे पहले उन्हें चप्पल ही पहनानी चाहिए।’
दुकानदार कुछ पल चुप रहा। उसने 800 रुपए की मजबूत चप्पल दिखाई। युवक ने बिना सोचे उसे खरीद लिया।
पैसे देकर वह जाने लगा, तभी दुकानदार ने उसे रोक लिया और एक दूसरा डिब्बा उसके हाथ में रख दिया।
‘यह दूसरी जोड़ी मेरी तरफ़ से तुम्हारी माँ के लिए है। उनसे कहना कि पहली घिस जाए तो दूसरी पहन लें, लेकिन अब कभी नंगे पैर न चलें।’
युवक की आँखें नम हो गईं।
फिर दुकानदार बोला, ‘एक चीज़ मुझे दे सकते हो?’
‘जी, ज़रूर।’
‘यह कागज़, जिस पर तुम्हारी माँ के पैरों की छाप है।’
युवक ने वह कागज़ उसे दे दिया और खुशी-खुशी चला गया।
दुकानदार ने उस कागज़ को अपने पूजाघर में रख दिया। बच्चों ने पूछा, ‘पापा, यह क्या है?’
दुकानदार की आँखें भीग गईं। उसने कहा, ‘बेटा, ये लक्ष्मी जी के पग हैं। माँ के त्याग और बेटे के प्रेम से बढ़कर इस दुनिया में कोई पूजा नहीं। जहाँ ऐसी माँ और ऐसा पुत्र हो, वहाँ भगवान स्वयं निवास करते हैं।’
▪️ शिक्षा: माँ के चरणों में ही संसार का सबसे बड़ा तीर्थ है। जिसने माँ के त्याग को समझ लिया, उसने ईश्वर को पा लिया।
