▪️सूर्यकांत उपाध्याय

एक बार एक पंडित जी ने एक दुकानदार के पास पाँच सौ रुपए सुरक्षित रख दिए। उन्होंने सोचा कि जब मेरी बेटी की शादी होगी, तब मैं यह पैसा ले लूँगा।
कुछ वर्षों बाद जब बेटी विवाह योग्य हो गई, तो पंडित जी उस दुकानदार के पास गए। लेकिन दुकानदार मुकर गया और बोला, ‘आपने मुझे कब पैसा दिया था? क्या कोई लिखित प्रमाण है?’
दुकानदार की इस हरकत से पंडित जी बहुत दुखी और चिंतित हो गए। कुछ दिनों बाद उन्हें विचार आया कि इस विषय में राजा से शिकायत की जाए। शायद राजा न्याय करके उनका पैसा वापस दिला दें, जिससे बेटी का विवाह हो सके।
पंडित जी राजा के दरबार में पहुँचे और अपनी व्यथा सुनाई। राजा ने कहा, ‘कल हमारी सवारी निकलेगी। तुम उस दुकानदार की दुकान के पास खड़े रहना।’
अगले दिन राजा की सवारी निकली। लोगों ने फूल-मालाएँ पहनाईं, किसी ने आरती उतारी। पंडित जी भी उसी दुकान के पास खड़े थे। जैसे ही राजा की दृष्टि उन पर पड़ी, उन्होंने तुरंत उन्हें प्रणाम किया और बोले, ‘गुरु जी! आप यहाँ कैसे? आइए, मेरे साथ बग्घी में बैठिए।’
यह दृश्य दुकानदार भी देख रहा था। उसने भी राजा की आरती उतारी। कुछ दूर जाने के बाद राजा ने पंडित जी से कहा, ‘पंडित जी, हमने अपना काम कर दिया। अब आगे आपका भाग्य।’ इतना कहकर उन्होंने उन्हें बग्घी से उतार दिया।
उधर दुकानदार यह देखकर घबरा गया। उसने सोचा, ‘पंडित जी का तो राजा से गहरा संबंध है। कहीं वे मेरी शिकायत न कर दें।’
उधर पंडित जी एक पेड़ के नीचे बैठे विचार कर रहे थे और आख़िरकार उन्होंने सबकुछ परमात्मा पर छोड़ दिया। तभी दुकानदार ने अपने मुनीम को पंडित जी को आदरपूर्वक बुलाकर लाने के लिए भेजा। मुनीम उन्हें सम्मानपूर्वक दुकान पर ले आया।
दुकानदार ने आते ही पंडित जी को प्रणाम किया और कहा, ‘पंडित जी, मैंने पुराने खाते देखे। उसमें आपके पाँच सौ रुपए जमा पाए गए। पिछले दस वर्षों का ब्याज जोड़ने पर बारह हजार रुपए और बनते हैं। आपकी बेटी मेरी बेटी के समान है। कृपया मेरी ओर से एक हजार रुपए और स्वीकार कीजिए तथा उसे बेटी के विवाह में लगाइए।’
इस प्रकार दुकानदार ने पंडित जी को कुल तेरह हजार पाँच सौ रुपए आदरपूर्वक दिए और प्रेम से विदा किया।
- शिक्षा : परमात्मा का आश्रय ही जीवन का सबसे बड़ा सहारा है।
