
▪️ देवशयनी एकादशी के साथ ही सनातन धर्म का अत्यंत पवित्र काल ‘चातुर्मास’ शुरू हो गया है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन से भगवान श्रीहरि विष्णु चार महीनों के लिए क्षीरसागर में योगनिद्रा में चले जाते हैं। इस अवधि में विवाह, गृहप्रवेश और अन्य मांगलिक कार्य सामान्यतः स्थगित रहते हैं, जबकि जप, तप, व्रत, दान और भगवान की भक्ति का विशेष महत्व माना जाता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, चातुर्मास आत्मसंयम, साधना और आध्यात्मिक उन्नति का समय है। इस दौरान श्रद्धालुओं को प्रतिदिन भगवान विष्णु की पूजा, ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जाप, विष्णु सहस्रनाम का पाठ तथा तुलसी दल अर्पित करना शुभ माना जाता है। घी का दीपक जलाकर आरती करने से भी विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है।
चातुर्मास में सात्विक जीवनशैली अपनाने पर विशेष बल दिया गया है। क्रोध, असत्य, नशा और तामसिक भोजन से दूर रहने की सलाह दी जाती है। कई श्रद्धालु इस अवधि में प्याज-लहसुन, मांसाहार और अन्य तामसिक खाद्य पदार्थों का त्याग करते हैं तथा अपनी क्षमता के अनुसार उपवास, दान और सेवा कार्य करते हैं।
धर्मग्रंथों के अनुसार, यह समय केवल बाहरी पूजा तक सीमित नहीं है, बल्कि मन, वचन और कर्म की शुद्धि का भी अवसर है। चातुर्मास के दौरान संयम, सत्संग, स्वाध्याय और परोपकार को जीवन में अपनाने से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होने और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होने की मान्यता है।
