▪️सूर्यकांत उपाध्याय

चमनलाल दिनभर धूप में इधर-उधर घूमकर टूटा-फूटा सामान और कबाड़ इकट्ठा करता था। शाम को वह उसे बड़े कबाड़ी को बेचकर अपने परिवार का गुजारा करता। एक दिन उसे एक घर से पुराना पानदान मिला, जिसे उसने मोलभाव के बाद एक रुपये में खरीद लिया।
थोड़ी दूर जाने पर एक व्यक्ति को वह पानदान पसंद आ गया और उसने उसे पाँच रुपये में खरीद लिया। लेकिन काफी प्रयास के बाद भी जब पानदान नहीं खुला, तो अगले दिन उसने उसे वापस करके अपने पाँच रुपये ले लिए। बड़े कबाड़ी ने भी पानदान न खुलने के कारण उसे नहीं खरीदा।
रविवार को चमनलाल बाजार में कबाड़ बेच रहा था। वहाँ एक ग्राहक ने पाँच रुपये देकर पानदान खरीद लिया, लेकिन अगले रविवार वह भी उसे वापस कर गया। बार-बार वही पानदान लौट आने से चमनलाल क्रोधित हो गया और उसने उसे जोर से जमीन पर पटक दिया। इस बार पानदान खुल गया। उसके भीतर से कई छोटे-छोटे बहुमूल्य हीरे निकलकर जमीन पर बिखर गए।
अगले दिन वह उस घर पहुँचा, जहाँ से उसने पानदान खरीदा था, लेकिन पता चला कि परिवार मकान बेचकर दूसरे शहर जा चुका है। बहुत प्रयास करने पर भी उनका पता नहीं चला। अंततः चमनलाल ने हीरे बेच दिए और धीरे-धीरे एक संपन्न व्यापारी बन गया। लोग उसे ‘सेठ चमनलाल’ के नाम से जानने लगे।
- शिक्षा : समय से पहले और भाग्य से अधिक किसी को कुछ नहीं मिलता। कई बार किस्मत अवसर का रूप लेकर हमारे सामने आती है, लेकिन हम उसे पहचान नहीं पाते।
