
▪️मुंबई
सोमैया विद्याविहार विश्वविद्यालय के के. जे. सोमैया स्कूल ऑफ लैंग्वेजेस एंड लिटरेचर द्वारा 24 और 25 जुलाई को ‘समकालीन साहित्य : नए संदर्भ’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय बहुभाषी संगोष्ठी उत्साहपूर्ण वातावरण में संपन्न हुई। देशभर से आए साहित्यकारों, अनुवादकों, समीक्षकों, कवियों और शोधकर्ताओं की सहभागिता से आयोजन को राष्ट्रीय स्वरूप मिला।
उद्घाटन सत्र की मुख्य अतिथि प्रख्यात लेखिका डॉ. सूर्यबाला थीं। उन्होंने कहा कि नवोदित लेखकों को रचनात्मक आलोचना स्वीकार करने की मानसिकता विकसित करनी चाहिए, क्योंकि यही उनके साहित्यिक विकास का आधार है। उन्होंने अनुवाद को भाषाओं, समाजों और संस्कृतियों के बीच सशक्त सेतु बताते हुए साहित्य में संवेदना, विवेक और शांति के मूल्यों को बढ़ावा देने पर जोर दिया।

कार्यक्रम का उद्घाटन विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. डॉ. अजय कपूर की विशेष उपस्थिति में हुआ। विभिन्न सत्रों में समकालीन कहानी, उपन्यास, कविता, अनुवाद और प्रकाशन संस्कृति जैसे विषयों पर गंभीर विमर्श हुआ।
इस अवसर पर डॉ. बाळासाहेब लबडे के उपन्यास ‘चिंबोरे युद्ध’ का लोकार्पण वरिष्ठ साहित्यकार, समीक्षक एवं प्रकाशक डॉ. कुसुमलता सिंह तथा लेखक-पत्रकार राजेश विक्रांत ने किया। डॉ. कुसुमलता सिंह ने इसे हिंदी व्यंग्य साहित्य की महत्वपूर्ण कृति बताया। संगोष्ठी में ‘चिंबोरे युद्ध’, ‘मुंबई… बंबई… बॉम्बे’, देवा झिंगाड की ‘एक रोटी तीन चूल्हे’, डॉ. हेमेंद्र चंडालिया द्वारा अनूदित ‘व्हीलचेयर पर लोकतंत्र’ तथा ‘माधव कौशिक की चयनित कविताएँ’ के अनूदित संस्करणों पर विशेष चर्चा हुई।
‘मुंबई… बंबई… बॉम्बे’ के हिंदी अनुवादक भारत वेडे ने अनुवाद प्रक्रिया के अनुभव साझा किए। वहीं प्रा. प्रतिभा सराफ के कहानी-संग्रह के हिंदी अनुवाद, जिसे डॉ. गोरख थोरात ने किया है, का लोकार्पण डॉ. सूर्यबाला ने किया। डॉ. बाळासाहेब लबडे ने समकालीन साहित्य, सामाजिक यथार्थ और अनुवाद की भूमिका पर अपने विचार रखे।

‘अनुवाद और प्रकाशन संस्कृति’ विषयक सत्र में डॉ. गोरख थोरात ने अनुवाद की चुनौतियों और बदलती प्रकाशन संस्कृति पर मार्गदर्शन दिया। इस दौरान मनोज पाठक (वर्णमुद्रा प्रकाशन) भी उपस्थित रहे। कार्यक्रम में डॉ. बळीराम गायकवाड, नरेंद्र पुंडरीक, अरुण सिंह (इंडिया इनसाइड), प्रा. प्रतिभा सराफ, डॉ. हेमेंद्र चंडालिया, भारत वेडे, देवा झिंगाड, राजेश विक्रांत तथा राजीव रोहित सहित अनेक साहित्यकारों ने सहभागिता की।
25 जुलाई को शोधपत्र प्रस्तुतिकरण, साहित्यिक संवाद और मुक्त चर्चा आयोजित हुई। समापन सत्र की अध्यक्षता वरिष्ठ कवि नरेंद्र पुंडरीक ने की। उन्होंने बहुभाषी साहित्य और अनुवाद को समाज की सांस्कृतिक एकता का आधार बताते हुए ऐसे आयोजनों की आवश्यकता पर बल दिया। अंत में आयोजकों ने सभी अतिथियों, शोधकर्ताओं, अनुवादकों और विद्यार्थियों का आभार व्यक्त किया।
