▪️ आत्मन मिश्र

हैलो!
किसी अजनबी से पहली मुलाकात में हम सबसे पहले क्या करते हैं? न हाथ मिलाते हैं, न मुस्कुराते हैं। अक्सर हम केवल एक शब्द कहते हैं-एक अभिवादन। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि फ़ोन उठाते ही हम जो सहजता से ‘हैलो’ कहते हैं, वह शब्द आया कहाँ से?
दिलचस्प बात यह है कि टेलीफोन के आविष्कार के बाद कई वर्षों तक पूरी दुनिया इस बात पर सहमत ही नहीं थी कि फ़ोन उठाते समय पहला शब्द क्या होना चाहिए।
कल्पना कीजिए, वर्ष 1876 है। आपने अभी-अभी दुनिया के सबसे अद्भुत आविष्कारों में से एक टेलीफोन घर लाया है। वह आपकी मेज़ पर रखा है। अचानक उसकी घंटी बजती है, पर उस समय न ‘हैलो’ था, न कोई तय शिष्टाचार, न ‘क्या मेरी आवाज़ सुनाई दे रही है?’ बस एक तार के दो सिरों पर दो लोग थे, जिन्हें यह भी नहीं पता था कि दूसरी ओर वास्तव में कोई है या नहीं।
कुछ लोग ज़ोर से पूछते, ‘क्या आप वहाँ हैं?’ तो कुछ लोग ‘हैलू (Halloo)!’ कहकर पुकारते। ‘हैलू’ अंग्रेज़ी की सदियों पुरानी शिकारी पुकार थी, जो जंगलों और खेतों में दूर तक गूँजती थी। इसका उल्लेख शेक्सपियर के साहित्य में भी मिलता है।
इसी बीच उस युग के दो महान आविष्कारकों के बीच एक रोचक मतभेद सामने आया।
टेलीफोन के आविष्कारक अलेक्ज़ेंडर ग्राहम बेल चाहते थे कि लोग फ़ोन उठाकर ‘अहोय (Ahoy)!’ कहें। यह वही शब्द था, जिससे नाविक समुद्र में दूसरे जहाज़ों को पुकारते थे। ज़रा कल्पना कीजिए, यदि बेल की बात मान ली गई होती, तो आज शायद हम कहते- ‘अहोय, माँ!’ या ‘अहोय, क्या यह पिज़्ज़ा की दुकान है?’
लेकिन थॉमस एडिसन की राय अलग थी। 1877 में उन्होंने ‘हैलो’ शब्द का समर्थन किया। उनका मानना था कि यह शब्द छोटा, स्पष्ट और इतना प्रभावी है कि खराब से खराब टेलीफोन लाइन पर भी आसानी से सुनाई दे सकता है। टेलीफोन ऑपरेटरों ने इसे अपनाया, फिर व्यापारिक संस्थानों ने, और धीरे-धीरे पूरी दुनिया ने।
हालाँकि अभिवादन की परंपरा टेलीफोन से कहीं अधिक पुरानी है। दुनिया की हर संस्कृति ने सदियों में अपने-अपने अभिवादन विकसित किए हैं।
भारत इसका सबसे सुंदर उदाहरण है। यहाँ हर कुछ सौ किलोमीटर पर अभिवादन बदल जाता है। कहीं ‘महादेव’, कहीं ‘नमस्कार’, कहीं ‘राम-राम’, ‘जय श्रीकृष्ण’, ‘जय जिनेंद्र’, ‘सत श्री अकाल’, ‘आदाब’, ‘सलाम अलैकुम’, ‘केम छो’, ‘वणक्कम’, ‘नमोस्कार’ और कहीं केवल ‘हैलो’।
ये केवल बातचीत शुरू करने वाले शब्द नहीं हैं; इनके पीछे संस्कृति, आस्था और सम्मान की गहरी भावना छिपी है।
‘नमस्ते’ संस्कृत के ‘नमस्’ (नमन) और ‘ते’ (आपको) से बना है, अर्थात ‘मैं आपको आदरपूर्वक प्रणाम करता हूँ।’ ‘सलाम’ का अर्थ है ‘शांति’। ‘सत श्री अकाल’ शाश्वत सत्य का स्मरण कराता है। फ्रांस में लोग ‘बोंजूर’ कहते हैं, तो इटली में ‘चाओ’।
टेलीफोन ने दुनिया को एक नई चुनौती दी। अब सामने वाले का चेहरा दिखाई नहीं देता था। इसलिए सबसे पहले यह बताना आवश्यक हो गया कि दूसरी ओर कोई मौजूद है।
यहीं से हर भाषा ने अपने-अपने ढंग से समाधान खोज लिया।
जापान में लोग फ़ोन उठाकर ‘मोशी मोशी’ कहते हैं। इटली में ‘प्रोंटो’, जिसका अर्थ है – ‘मैं तैयार हूँ।’ लैटिन अमेरिका के कई हिस्सों में लोग ‘बुएनो’ कहते हैं। भारत के अनेक क्षेत्रों में लोग फ़ोन उठाते ही अपना नाम बता देते हैं।
भाषा चाहे कोई भी हो, संदेश एक ही होता है-
‘हाँ, मैं यहाँ हूँ।’
यही एक छोटा-सा वाक्य दो लोगों के बीच पहला पुल बनाता है।
व्यापार शुरू होने से पहले, हालचाल पूछने से पहले, किसी शुभ समाचार या बुरी ख़बर से पहले, यहाँ तक कि ‘आप कहाँ हैं?’ पूछने से पहले भी एक अभिवादन दो अनजान लोगों को जोड़ देता है।
शायद इसी कारण अभिवादन मानव सभ्यता की सबसे पुरानी और सबसे सुंदर परंपराओं में से एक है। यह केवल बातचीत की शुरुआत नहीं बल्कि यह कहने का सबसे सरल और विनम्र तरीका है- ‘मैं आपको देखता हूँ, आपका सम्मान करता हूँ।’
हैलो।
और यदि इतिहास ने कोई दूसरा मोड़ लिया होता…तो शायद आज पूरी दुनिया एक-दूसरे से मुस्कुराकर कह रही होती- ‘अहोय!’
