▪️ सूर्यकांत उपाध्याय

जंगल में एक गर्भवती हिरनी अपने शावक को जन्म देने वाली थी। वह एकांत स्थान की तलाश में भटक रही थी कि तभी उसे नदी किनारे ऊँची और घनी घास दिखाई दी। उसे वह स्थान प्रसव के लिए उपयुक्त लगा। जैसे ही वह वहाँ पहुँची, उसे प्रसव पीड़ा शुरू हो गई।
उसी समय आसमान में घनघोर बादल छा गए। वर्षा होने को थी और बिजली कड़कने लगी। उसने बाईं ओर देखा, तो एक शिकारी उसकी ओर तीर साधे खड़ा था। घबराकर उसने दाईं ओर देखा, तो वहाँ एक भूखा शेर उस पर झपटने के लिए तैयार बैठा था। सामने सूखी घास में आग लग चुकी थी और पीछे उफनती नदी थी।
मादा हिरनी क्या करती? वह प्रसव पीड़ा से व्याकुल थी। अब क्या होगा? क्या वह जीवित बच पाएगी? क्या वह अपने शावक को जन्म दे पाएगी? क्या शावक जीवित रहेगा? क्या जंगल की आग सब कुछ जला देगी? क्या वह शिकारी के तीर से बच पाएगी? क्या वह भूखे शेर का भोजन बन जाएगी?
चारों ओर संकट से घिरी हिरनी ने स्वयं को ईश्वर पर छोड़ दिया और अपना पूरा ध्यान अपने शावक को जन्म देने में लगा दिया।
तभी प्रकृति का अद्भुत चमत्कार हुआ। तेज़ बिजली चमकी। उसी क्षण शिकारी ने तीर छोड़ा, लेकिन बिजली की चमक से उसकी आँखें चौंधिया गईं। तीर हिरनी के पास से निकलकर सीधे शेर की आँख में जा लगा। घायल शेर दहाड़ता हुआ इधर-उधर भाग गया। शिकारी शेर को घायल देखकर भयभीत हो गया और वहाँ से भाग निकला। इसी बीच मूसलाधार वर्षा शुरू हो गई और जंगल की आग भी बुझ गई।
हिरनी ने सुरक्षित अपने शावक को जन्म दिया।
- शिक्षा : कठिन समय में अपने कर्तव्य कर्म करते हुए उसे ईश्वर पर छोड़ देना चाहिए। उचित समय पर वही ईश्वर हमारे लिए सर्वोत्तम निर्णय करता है।
