▪️ पुस्तक समीक्षा @राजेश विक्रांत

प्रभात प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित ‘यशस्वी भारत’ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के वर्तमान सरसंघचालक माननीय मोहनराव भागवत के विभिन्न अवसरों पर दिए गए भाषणों का संकलन है। इस पुस्तक को मैं स्वर्णिम भारत के निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण वैचारिक खुराक मानता हूँ।
यदि आरएसएस की बात करें तो यह एक ऐसा सांस्कृतिक संगठन है, जिसके लाखों समर्पित स्वयंसेवक राष्ट्र-निर्माण में लगे हैं और भारत को परम वैभव-संपन्न बनाने के लिए कृतसंकल्प हैं। इसी उद्देश्य से डॉ. के. बी. हेडगेवार ने वर्ष 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की थी। यह संगठन सेवा, शिक्षा, चिकित्सा, छात्र, मजदूर, राजनीति तथा अन्य अनेक क्षेत्रों में ‘राष्ट्र प्रथम’ के ध्येय के साथ समर्पित भाव से कार्य कर रहा है। संघ को समझना आसान नहीं है। दुनिया की किसी अन्य संस्था या संगठन से इसकी तुलना नहीं की जा सकती। अपने भाषणों में मोहनराव भागवत बार-बार कहते हैं, ‘संघ को समझना हो तो संघ में आइए।’ इसलिए ‘यशस्वी भारत’ को पढ़ना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचारों और कार्यपद्धति को समझने का एक माध्यम है।
पुस्तक की ‘प्रस्तावना’ में मा. गो. वैद्य ने लिखा है, ‘भारत की वर्तमान पीढ़ी इस ‘यशस्वी भारत’ को पढ़े और उसमें व्यक्त विचारों पर मनन करे। संघ को समझने का अर्थ उसकी अनुभूति करना है। इसलिए हमें यथासंभव शाखा के कार्य से जुड़कर सामाजिक एकता और सामाजिकता का अनुभव प्राप्त करते हुए अपने जीवन को समृद्ध एवं सार्थक बनाना चाहिए।’
‘यशस्वी भारत’ में ‘राष्ट्रीयता हो संवाद का आधार’, ‘हिंदू : विविधता में एकता के उपासक’, ‘संकल्पित हों हिंदू’, ‘बदलना होगा समाज का आचरण’, ‘आंबेडकर और उनका भारत’, ‘देश का भवितव्य’, ‘अहिंसा : सिद्धांत और आचरण’, ‘विकास की अवधारणा’, ‘अमर राष्ट्र भारत’, ‘स्त्री सशक्तीकरण : चाहिए अपना विमर्श’, ‘संघ : एक विचार’, ‘चाहिए संपूर्ण समाज का बल’, ‘संघ का दृष्टिकोण’, ‘संघ का कार्य : व्यक्ति-निर्माण’, ‘संघ विषयक कुछ जिज्ञासाएँ’, ‘समापन’ तथा ‘भारत के ‘स्व’ की पहचान’ जैसे विषयों पर विचार प्रस्तुत किए गए हैं। इससे स्पष्ट होता है कि मोहन भागवत ने जीवन और समाज के विविध पक्षों को संघ के दृष्टिकोण से जोड़ते हुए गहन एवं सार्थक विचार व्यक्त किए हैं। इन विचारों के आलोक में सामान्य व्यक्ति भी अपने जीवन को नई दिशा दे सकता है।
यह पुस्तक हमें बताती है कि हमें दुर्बल नहीं रहना है, बल्कि संगठित होकर सभी की चिंता करनी है। भारत की परंपरागत संस्कृति के आधार पर यह देश कभी परम वैभव-संपन्न और शक्तिशाली राष्ट्र रहा है, जिसने अपनी शक्ति का उपयोग किसी अन्य देश को रौंदने के लिए नहीं, बल्कि पूरी दुनिया को शांति और सद्भाव का संदेश देने के लिए किया। पुस्तक संपूर्ण समाज को आत्मीयता के साथ जोड़ने, निस्वार्थ जीवन जीने, संगठन की शक्ति को समझने तथा राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानने का संदेश देती है।
पुस्तक के अनुसार राष्ट्रीयता संवाद का आधार होनी चाहिए। संघ का प्रमुख कार्य व्यक्ति-निर्माण है और श्रेष्ठ व्यक्ति ही श्रेष्ठ समाज का निर्माण करते हैं। भारत से निकले सभी संप्रदायों के सामूहिक मूल्यबोध को ‘हिंदुत्व’ कहा गया है। पुस्तक में यह भी कहा गया है कि हमारा उद्देश्य किसी का विरोध या विनाश नहीं, बल्कि सभी को साथ लेकर चलना है। समाज में आत्मीयता, संगठन, मातृभूमि के प्रति समर्पण तथा मानवता के कल्याण की भावना ही भारत की वास्तविक पहचान है।
कुल मिलाकर ‘यशस्वी भारत’ वर्तमान पीढ़ी के लिए एक उपयोगी और विचारोत्तेजक पुस्तक है। प्रभात प्रकाशन ने इसका प्रकाशन कर एक महत्वपूर्ण कार्य किया है। पुस्तक का संपादन श्री श्याम किशोर ने किया है। 286 पृष्ठों की इस पेपरबैक पुस्तक का मूल्य 400 रुपए है। मेरा मानना है कि इस पुस्तक के माध्यम से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की मूल भावना और उसके वैचारिक दृष्टिकोण को अपेक्षाकृत सरलता से समझा जा सकता है।
