▪️सूर्यकांत उपाध्याय

कहते हैं, ‘पूत के पांव पालने में ही दिखाई दे जाते हैं।’ श्रीराम और लक्ष्मण के दिव्य प्रेम की पहली झलक भी जन्म लेते ही संसार को मिल गई थी।
जब अयोध्या में चारों राजकुमार श्रीराम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न का जन्म हुआ, तब उन्हें अलग-अलग पालनों में सुलाया गया। कुछ ही देर में श्रीराम, भरत और शत्रुघ्न शांत हो गए, लेकिन लक्ष्मण जी का रुदन थमने का नाम ही नहीं ले रहा था। तीनों माताएं व्याकुल थीं, महाराज दशरथ चिंतित थे। हर उपाय किया गया, किंतु लक्ष्मण शांत नहीं हुए। मान्यता है कि देवताओं ने भी उन्हें शांत कराने का प्रयास किया, पर सफलता नहीं मिली।
तभी महर्षि वशिष्ठ वहां पहुंचे। उन्होंने लक्ष्मण जी को उठाकर श्रीराम के पालने में उनके चरणों के समीप लिटा दिया। जैसे ही लक्ष्मण श्रीराम के चरणों से लगे, उनका रोना पल भर में थम गया। मानो आत्मा अपने परम आश्रय से मिल गई हो। उसी क्षण यह स्पष्ट हो गया कि लक्ष्मण का जीवन श्रीराम के चरणों की सेवा और उनके साथ चलने के लिए ही है।
यही कारण है कि वनवास हो, कठिन संघर्ष हो या लंका का महासंग्राम लक्ष्मण हर पल श्रीराम की छाया बनकर रहे। और जब युद्धभूमि में लक्ष्मण मूर्छित होकर गिर पड़े, तब श्रीराम का हृदय करुणा से भर उठा। उन्होंने व्यथित होकर कहा कि ऐसा क्षत्रिय संसार को क्या मुंह दिखाएगा, जो अपनी ही आत्मा समान भाई की रक्षा न कर सका।
राम और लक्ष्मण का यह संबंध केवल दो भाइयों का नहीं बल्कि प्रेम, समर्पण, सेवा और त्याग की उस अमर परंपरा का प्रतीक है, जो युगों-युगों तक मानवता का पथ आलोकित करती रहेगी।
राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे।
सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने।।
