▪️सूर्यकांत उपाध्याय

एक बार एक शिक्षक अपने संपन्न परिवार से संबंध रखने वाले युवा शिष्य के साथ टहलने निकले। रास्ते में उन्हें पुराने जूतों की एक जोड़ी दिखाई दी। वे जूते पास के खेत में काम कर रहे एक गरीब मजदूर के थे, जो अपना काम समाप्त कर घर लौटने वाला था।
शिष्य ने मुस्कराते हुए कहा, ‘गुरुजी, क्यों न हम ये जूते कहीं छिपा दें और झाड़ियों के पीछे छिपकर देखें? जब मजदूर इन्हें नहीं पाएगा तो उसकी घबराहट देखकर बड़ा मजा आएगा।’
शिक्षक गंभीर स्वर में बोले, ‘किसी गरीब का मजाक उड़ाना उचित नहीं। क्यों न हम इन जूतों में कुछ सिक्के रख दें और फिर देखें कि इसका उस मजदूर पर क्या प्रभाव पड़ता है?’
शिष्य ने वैसा ही किया और दोनों झाड़ियों के पीछे छिप गए। कुछ देर बाद मजदूर आया। जैसे ही उसने जूता पहना, उसे भीतर कुछ कठोर महसूस हुआ। उसने जूता उतारकर देखा तो उसमें सिक्के थे। वह आश्चर्यचकित होकर उन्हें देखने लगा। फिर दूसरा जूता उठाया, उसमें भी सिक्के रखे थे।
मजदूर की आंखें नम हो गईं। उसने हाथ जोड़कर आकाश की ओर देखते हुए कहा, ‘हे भगवान! समय पर मिली इस सहायता के लिए उस अज्ञात दानी का लाख-लाख धन्यवाद। उसकी दयालुता से आज मेरी बीमार पत्नी की दवा और मेरे भूखे बच्चों के लिए रोटी का प्रबंध हो सकेगा।’
यह सुनकर शिष्य की आंखें भी भर आईं। शिक्षक ने पूछा, ‘बताओ, जूते छिपाने से अधिक आनंद मिला या किसी की सहायता करने से?’
शिष्य विनम्र होकर बोला, ‘गुरुदेव, आज मैंने जीवन का अमूल्य पाठ सीखा है।’
