▪️ सूर्यकांत उपाध्याय

एक व्यक्ति एक सेठ की दुकान पर नौकरी करता था। वह बेहद ईमानदारी और लगन से काम करता था। उसके काम से सेठ बहुत खुश था और मिलने वाली तनख्वाह से उसका घर भी ठीक से चल रहा था।
एक दिन वह बिना बताए काम पर नहीं आया। उसके न आने से सेठ का काम प्रभावित हुआ। सेठ ने सोचा कि यह व्यक्ति लंबे समय से ईमानदारी से काम कर रहा है, लेकिन मैंने कभी इसकी तनख्वाह नहीं बढ़ाई। इतने पैसों में इसका गुजारा कैसे होता होगा? यह सोचकर उसने अगले महीने से उसकी तनख्वाह बढ़ा दी।
जब कर्मचारी को बढ़ी हुई तनख्वाह मिली तो वह चुपचाप पैसे लेकर चला गया। उसने सेठ को धन्यवाद तक नहीं दिया। कुछ महीनों बाद वह फिर एक दिन काम पर नहीं आया। इस बार सेठ को बहुत गुस्सा आया। उसने सोचा, मैंने इसकी तनख्वाह बढ़ाई, फिर भी इसे अपनी जिम्मेदारी का अहसास नहीं हुआ। उसने अगले महीने उसकी तनख्वाह फिर से पहले जितनी कर दी।
हैरानी की बात यह थी कि कर्मचारी ने इस बार भी कोई शिकायत नहीं की। आखिरकार सेठ ने उससे पूछ ही लिया कि वह हर परिस्थिति में इतना शांत क्यों रहता है।
कर्मचारी ने कहा, ‘जब पहली बार मैं काम पर नहीं आया था, उस दिन मेरे घर बच्चे का जन्म हुआ था। आपने उसी के बाद मेरी तनख्वाह बढ़ाई। मैंने इसे ईश्वर की ओर से बच्चे के पालन-पोषण के लिए भेजा गया हिस्सा समझा। इसलिए मैं बहुत अधिक खुश नहीं हुआ।
दूसरी बार मेरी मां का निधन हुआ था। उसके बाद आपने मेरी तनख्वाह कम कर दी। मैंने इसे इस रूप में लिया कि मेरी मां अपने हिस्से का धन अपने साथ ले गईं। फिर मैं तनख्वाह के लिए क्यों परेशान होता?’
कर्मचारी की बात सुनकर सेठ की आंखें खुल गईं। उसने उसे गले लगाया और अपने व्यवहार के लिए क्षमा मांगी।
- शिक्षा: जो व्यक्ति अच्छे समय में अहंकार नहीं करता और बुरे समय में टूटता नहीं, वही जीवन में स्थायी सफलता प्राप्त करता है।
